विश्व की भाषायें

दुनिया की कितनी भाषाएं हैं इसका उत्तर देना ठीक तरह से संभव नहीं है। एक अनुमान के अनुसार दुनिया में कुल भाषाओं की संख्या 6809 है, इनमें से 90 फीसदी भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 1 लाख से भी कम है। लगभग 200 से 150 भाषाएं ऐसी हैं जिनको 10 लाख से अधिक लोग बोलते हैं। लगभग 357 भाषाएं ऐसी हैं जिनको मात्र 50 लोग ही बोलते हैं। इतना ही नहीं 46 भाषाएं ऐसी भी हैं जिनको बोलने वालों की संख्या मात्र 1 है।
दुर्भाग्यवश संचार के माध्यमों में वृद्धि के साथ ही कई ऐसी छोटी भाषाएं हैं जो लुप्तप्राय हैं। इन भाषाओं के लुप्त होने के साथ ही इनके बोलने वालों की संस्कृति भी समाप्त हो जाएगी।

पारिवारिक वर्गीकरण
संस्कृत, ग्रीक, लेटिन आदि भाषाओं का अध्ययन करने पर यह मालूम होता है कि वे किसी एक ही मूल भाषा से निकली हैं। इसी आधार पर भाषाओं को परिवारों में बांटने का प्रयास किया जाता है। भाषा परिवारों के बारे में अलग-अलग विद्वानों की अलग-अलग राय है। भाषा परिवारों के नाम और उनमें शामिल प्रमुख भाषाएं इस प्रकार हैं-

भारोपीय परिवार
यह सर्वप्रमुख भाषा परिवार है जिसके बोलने वालों की संख्या विश्व में सबसे ज्यादा है। इस भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएं संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, हिंदी, बंगाली, फारसी, ग्रीक, लेटिन, अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, पुर्तगाली, इतालवी इत्यादि हैं।

यूराल परिवार
इस परिवार की भाषाएं यूरोप में बोली जाती हैं। प्रमुख भाषाएं हंगेरियन, फिन्निश और मॉर्डिविन हैं।

अल्टाइक परिवार
इस भाषा परिवार की भाषाएं यूरोप (तुर्की), मध्य एशिया (उज्बेक), मंगोलिया (मंगोलियन), सुदूर पूर्व एशिया (कोरियाई, जापानी) इत्यादि में बोली जाती हैं।

चीनी परिवार
यह एशिया का प्रमुख भाषा परिवार है जिसमें दुनिया की सबसे ज्यादा बोलने वाली भाषा मंदारिन (चीनी) शामिल है। इस परिवार की प्रमुख भाषाएं मंदारिन, तिब्बती या मोट, बर्मी, थाई, मैतेई, गारो, नागा, बोडो, नेबारी आदि हैं। यह सभी भाषाएं ध्वनि आधारित हैं।

मलय-पॉलीनेशियन परिवार
इस भाषा परिवार में लगभग 1000 भाषाएं शामिल हैं और ये भाषाएं मुख्य रूप से हिंद व प्रशांत महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में बोली जाती हैं। इस भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएं हैं- मलाया, इंडोनेशियाई, माओरी, फिजियन, हवाइयन इत्यादि।

अफ्रीकी-एशियाई परिवार
इस भाषा परिवार में उत्तरी अफ्रीका और मध्य-पूर्व की भाषाएं शामिल हैं। मुख्य भाषाओं में अरबी और हिब्रू शामिल हैं।

कॉकेशियाई परिवार
इस परिवार की भाषाएं मुख्य रूप से काला सागर और कैस्पियन सागर के बीच स्थित देशों के लोगों द्वारा बोली जाती हैं। जॉर्जियाई और चेचेन इस परिवार की मुख्य भाषाएं हैं।

द्रविड़ परिवार
इस भाषा परिवार की भाषाएं भारत के दक्षिणी राज्यों में बोली जाती हैं। तमिल, कन्नड़, तेलुगू इस भाषा परिवार की प्रमुख भाषाएं हैं।

ऑस्ट्रो-एशियाटिक परिवार
इस परिवार की भाषाएं एशिया में भारत के पूर्वी हिस्से से लेकर वियतनाम तक बोली जाती हैं। प्रमुख भाषाओं में वियतनामी और ख्मेर शामिल हैं।

नाइजर-कांगो परिवार
इस भाषा परिवार की भाषाएं दक्षिणी सहारा के इलाके में बोली जाती हैं। प्रमुख भाषाओं में स्वाहिली, शोना, झोसा और जुलु शामिल हैं।

अमेरिका परिवार
इस भाषा परिवार में उत्तरी अमेरिका, मध्य अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, ग्रीनलैंड इत्यादि की भाषाएं शामिल हैं। प्रमुख भाषाओं में एस्किमो (ग्रीनलैंड), अथबस्कन (कनाडा और सं. रा. अमेरिका), नहुअव्ल (मैक्सिको), करीब, चेरोकी (पनामा के पूर्व में), गुआर्नी अरबक, क्वाचुआ, नुत्का इत्यादि।

भारतीय भाषाएं
प्रसिद्ध भाषाविद ग्रियर्सन के अनुसार भारत में भाषाओं की संख्या 179 और बोलियों की संख्या 544 है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में कुल भाषाओं की संख्या 418 है, जिनमें 407 जीवित भाषाएं हैं जबकि 11 लुप्त हो चुकी हैं।
भारत का संविधान अपनी 8वीं अनुसूची में 18 भाषाओं को मान्यता देता है। देवनागरी लिपि में हिन्दी भारतीय संघ की भाषा है जबकि विभिन्न प्रदेशों की अपनी-अपनी सरकारी भाषाएं हैं। अंग्रेजी भारतीय संघ की दूसरी राजभाषा है। अंग्रेजी का प्रयोग केेंद्र सरकार गैर-हिंदी भाषी राज्यों के साथ संवाद में करती है। अंग्रेजी नागालैंड और मेघालय की राजभाषा है। भारत का संविधान 22 भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देता है जो पूरे देश में बोली जाती हैं।

हिंदी और अंग्रेजी के अतिरिक्त भारत का संविधान 21 अन्य भाषाओं को मान्यता प्रदान करता है।

 

भाषा  
 राज्य की राजभाषा
असमी
   असम
बंगाली
त्रिपुरा व पश्चिम बंगाल
बोडो 
असम
डोगरी
जम्मू व कश्मीर
गुजराती दादरा व नागरहवेली, दमन व                 दीव, गुजरात
कन्नड़
कर्नाटक
कश्मीरी जम्मू-कश्मीर
कोंकणी गोवा
मलयालम केरल, लक्षद्वीप व पुदुचेरी
मैथिली
बिहार
मणिपुरी मणिपुर
मराठी
महाराष्ट्र
नेपाली
सिक्किम
उडिय़ा
  उड़ीसा
पंजाबी
पंजाब व चंडीगढ
संस्कृत यह किसी राज्य की भाषा नहींहै
संथाली

छोटानागपुर पठार के संथालों की भाषा (किसीराज्य की राजभाषा नहीं)

सिंधी
सिंधी समुदाय की  भाषा
तमिल तमिलनाडु व पुदुचेरी
तेलुगू आंध्र प्रदेश
उर्दू 
जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, दिल्ली व उत्तर      प्रदेश

     
  
  
   
     
भाषाई दृष्टिकोण से भारत में काफी विविधता है। भारतीय भाषाओं का उद्भव व विकास अलग-अलग तरीके से हुआ है और वे भारतीय के विभिन्न जातीय समूहों से संबंधित हैं। भारत में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। देश की कुल जनसंख्या का 73 फीसदी भारोपीय परिवार की, 25 फीसदी द्रविड़ परिवार की, 1.3 फीसदी आस्ट्रिक परिवार की तथा मात्र 0.7 फीसदी भाग चीनी-तिब्बत परिवार की भाषाएं बोलता है।

भारतीय भाषाओं को मुख्य रूप से चार परिवारों में वर्गीकृत किया जाता है-

(1) इंडो-यूरोपीय या भारोपीय परिवार

(2) द्रविड़ परिवार

(3)आस्ट्रिक परिवार व

(4) चीनी-तिब्बती परिवार।

भारोपीय और द्रविड़ परिवार देश के प्रमुख भाषा परिवार हैं।

भारोपीय परिवार
यह भारतीय भाषाओं में सबसे महत्वपूर्ण भाषा परिवार है और देश की प्रमुख भाषाएं हिंदी, बंगाली, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी, असमी, उडिय़ा, कश्मीरी, उर्दू, मैथिली और संस्कृत इसमें शामिल हैं।

द्रविड़ परिवार
यह देश का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण भाषा परिवार है जिसमें दक्षिण भारत में बोली जाने वाली लगभग सभी भाषाएं शामिल हैं। द्रविड़ भाषाएं काफी प्राचीन हैं। इस भाषा परिवार की भाषाओं का देश के बाहर की भाषाओं से कोई संबंध नहीं है। रूसी भाषाशास्त्री एस. एस. एंद्रोनोव के अनुसार प्रोटो-द्रविड़ से 21 द्रविड़ भाषाओं की उत्पत्ति हुई। इस भाषा परिवार को तीन भागों- दक्षिणी द्रविड़ वर्ग, मध्य द्रविड़ वर्ग व उत्तरी द्रविड़ वर्ग में विभाजित किया जाता है। इस परिवार की सात मुख्य भाषाएं- कन्नड़, तमिल, मलयालम, तुलु, कोडागू, तोडा और कोटा हैं।

चीनी-तिब्बत परिवार
इस भाषा परिवार के बोलने वाले उत्तरी बिहार, उत्तरी बंगाल और असम में पाये जाते हैं। इन भाषाओं को भारोपीय परिवार की भाषाओं से अधिक पुराना माना जाता है और इनके बोलने वालों को प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में किरात के नाम से जाना जाता था।
इस समूह की भाषाओं को तीन शाखाओं में विभाजित किया जाता है-
(1) तिब्बती हिमालय,

(2) उत्तरी असम तथा

(3) असमी-म्यांमारी।

तिब्बती-हिमालयी भाषाओं को दो वर्र्गों में विभाजित किया गया है-

(1) भोटिया वर्ग तथा

(2) हिमालय वर्ग।

भोटिया वर्ग की भाषाओं में तिब्बती, बाल्ती, लद्दाखी, लाहूली, शेरपा, सिक्किमी-भोटिया आदि भाषाएं शामिल हैं। हिमालय वर्ग में चम्बा, लाहौली, किन्नौरी और लेप्चा भाषाएं आती हैं। उत्तरी असमी वर्ग में 6 बोलियां शामिल हैं-
अका, डफला, मिरी, अबोर, मिश्मी तथा मिशिंग। असमी-म्यांमारी वर्ग की भाषाओं को पांच उपवर्र्गों में विभाजित किया जाता है- बोडो, नागा, कचिन, कुकिचिन और म्यांमारी-बर्मी।

ऑस्ट्रिक परिवार
ऑस्ट्रिक भाषा परिवार का विकास भूमध्य सागर से आये हुए निवासियों द्वारा हुआ। ऑस्ट्रिक भाषाएं मध्य और पूर्वी भारत के पहाड़ी व वन इलाकों में बोली जाती हैं। ये काफी प्राचीन भाषाएं हैं और इनको बोलने वालों को प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में निषाद कहा जाता था। इस भाषा परिवार की सबसे महत्वपूर्ण भाषा संथाली है जिसे लगभग 50 लाख संथाल बोलते हैं। मुंडा जनजाति द्वारा बोली जाने वाली मुंदरी दूसरी सबसे महत्वपूर्ण भाषा है।

अन्य भाषाएं
गोंडी, ओरांव, मल-पहाडिय़ा, खोंड और पारजी जैसी कुछ आदिवासी भाषाएं हैं जो अपने-आप में अनूठी हैं और इन्हें किसी भाषा परिवार के अंतर्गत नहीं रखा जा सकता है।

राजभाषा
केद्र सरकार अपने कार्र्यों के निष्पादन के लिए दो भाषाओं का इस्तेमाल करती है:
1. हिंदी भाषी राज्यों के साथ संवाद में केेंद्र सरकार हिंदी का प्रयोग करती है। हिंदी अरुणाचल प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, बिहार, चंडीगढ, छत्तीसगढ, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और उत्तरांचल राज्यों की भी राजभाषा है।

पश्चिमी चित्रकला

27000-13000 ई.पू. में दक्षिण-पश्चिम यूरोप में गुफा कला के द्वारा तत्कालीन मानव ने अपने जीवन का चित्रण किया। अफ्रीकी कला, इस्लामिक कला, भारतीय कला, चीनी कला और जापानी कला- इन सभी का पूरा प्रभाव पश्चिमी चित्रकला पर पड़ा है।

प्राचीन रोमन व ग्रीक चित्रकला
प्राचीन ग्रीक संस्कृति विजुअल कला के क्षेत्र में अपने आसाधारण योगदान के लिए विख्यात है। प्राचीन ग्रीक चित्रकारी मुख्यतया अलंकृत पात्रों के रूप में मिली है। प्लिनी द एल्डर के अनुसार इन पात्रों की चित्रकारी इतनी यथार्थ थी कि पक्षी उन पर चित्रित अंगूरों को सही समझ कर खाने की कोशिश करते थे।
रोमन चित्रकारी काफी हद तक ग्रीक चित्रकारी से प्रभावित थी। लेकिन रोमन चित्रकारी की कोई अपनी विशेषता नहीं है। रोमन भित्ति चित्र आज भी दक्षिणी इटली में देखे जा सकते हैं।

मध्यकालीन शैली
बाइजेंटाइन काल (330-1453 ई.) के दौरान बाइजेंटाइन कला ने रुढि़वादी ईसाई मूल्यों को व्यवहारिक या लौकिक पच्चीकारी या प्रतिमाओं के रूप में व्यक्त किया।
बाइजेंटाइन कला की तुलना वर्तमान काल की अमूर्त कला से की जा सकती है।
मध्यकाल के दौरान रोमांनेस्क्यू और गोथिक चर्र्चों को स्थापत्य और भित्ति चित्रों से अलंकृत किया गया। तत्कालीन भित्ति चित्रों में एक विशेष अपील है। बाइजेंटाइन स्थापत्य व वास्तुकला के प्रभाव से रोमांनेस्क्यू काल में पैनल चित्रकारी एक सामान्य चीज हो गई। 13वीं शताब्दी के मध्यकाल तक आते-आते मध्यकालीन कला व गोथिक चित्रकारी यथार्थवादी हो गई। यथार्थवादी कला का सबसे ज्यादा प्रभाव इटली पर पड़ा। इस काल के चर्र्चों में अधिक खिड़कियां बनाई जाने लगींऔर अलंकरण के लिए रंगीन स्टेन शीशों का प्रयोग किया जाने लगा। नोत्रे देम द पेरिस का चर्च इस शैली की प्रतिनिधि इमारत है।

नवजागरणकाल और सदाचारवाद (Renaissance and Mannerism)
इस काल के दौरान डोनाटेल्ले, लिप्पी और बोटसेल्ली ने ग्रीक और रोमन स्थापत्यकला, साहित्य और चित्रकारी में लोगों की रुचि जगाई। फ्लोरेंस नवजागरण का केेंद्र बिंदु था। इस काल के कलाकारों ने चित्रकारी के लिए तैलीय रंगों का आविष्कार किया। लियोनार्डो द विन्सी, माइकेलएंजिलो, राफेल, जिओवन्नी बेल्लिनी और टिटियन जैसे महान कलाकारों ने चित्रकारी को एक नया आयाम व ऊँचाई प्रदान की। इस काल की चित्रकारी में मानव शरीर को एक अलग अंदाज में चित्रित किया गया।
हैंस हॉलबीन द यंगर, अल्ब्रेख्त ड्यूरर, लुकाच क्रेनाच, मैथियास ग्रेुनेवाल्ड औ्रर पीटर ब्रुगेल जैसे फ्लेमिश, डच और जर्मन चित्रकारों नेे इतालवी चित्रकारों की अपेक्षा अधिक यथार्थवादी शैली का विकास किया।
उच्चनवजागरणकाल की शैली से एक कलात्मक शैली सदाचारवाद का विकास हुआ। रोमानो, पोंटार्मो और पर्मीजिआनिनो जैसे कालकारों ने नवजागरण काल की खोजों को अरूढ़ शैली में व्यक्त किया।

डच स्कूल
नीदरलैंड में 17वीं शताब्दी के दौैरान डच चित्रकारी का जन्म हुआ। वन हिक, हल्सन और रेम्ब्रां जैसे चित्रकारों ने शांत जीवन एवं प्रतिदिन के प्रसंगों का चित्रण किया।

शास्त्रीयवाद
17वीं शताब्दी की चित्रकारी में शास्त्रीयवाद मुख्य शैली थी जिसका मुख्य प्रभाव कैथोलिक देशों- इटली व फ्रांस पर विशेष रूप से पड़ा। लॉरेन और पाऊस्सिन जैसे कलाकारों ने उत्तर सदाचारवादियों की शुष्कता के खिलाफ विद्रोह करते हुए उच्च नवजागरण काल के प्रकृतिवाद की ओर अपना रुख किया।

नव्य-शास्त्रीयवाद
18वीं शताब्दी में इटली और ग्रीक की प्राचीन सभ्यताओं के उत्खनन के बाद नव्य-शास्त्रीयवाद का उदय हुआ। नव्य-शास्त्रीयवादी चित्रकारों ने मुख्य रूप से रूमानियत और उदात्तता पर ध्यान दिया। डेविड और इन्ग्रेस इस शैली के प्रतिनिधि कलाकार थे।

रोमांसवाद
कला में रोमांसवाद का उदय 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ और इसका प्रभाव 19वीं शताब्दी के मध्य तक रहा। च्कला कला के लिएज्  का नारा फ्रांसिस्को डि गोया, जॉन कांस्टेबल और जे. एम. डब्ल्यू. टर्नर जैसे चित्रकारों ने दिया। रोमांटिक चित्रकारों ने लैंडस्केप चित्रकारी को एक शैली का रूप दिया। मुख्य रूप से इस वाद के कलाकारों ने शास्त्रीयवाद और नव्य-शास्त्रीयवाद के सौंदर्यात्मक और नीतिवाद मूल्यों के खिलाफ विद्रोह करते हुए चित्रों में रूमानी भावनाओं की अभिव्यक्ति की।

यथार्थवाद (1840-1880 ई.)
यथार्थवाद का जन्म फ्रांस में हुआ और जल्दी ही पूरे यूरोप और अमेरिका में इसका प्रसार हो गया। कॉउरबेट और मिलेट ने रोमांसवाद की आत्मनिष्ठता एवं व्यक्तिवादिता के खिलाफ विद्रोह करते हुए प्रकृतिवादी शैली अपनाते हुए प्राकृतिक दृश्यों और सामान्य जीवन के चित्र उकेरे।

प्रभाववाद (19वीं शताब्दी का अंतिम काल)
रेनॉयर और देगास ने अपनी प्रथम प्रभाववादी प्रदर्शनी का 1874 में पेरिस में आयोजन किया। इनके विषयों में लैंडस्केप और शहरी जीवन का चित्रण करना शामिल था। सिउरेट ने प्रभाववादियों के कार्य को आगे बढ़ाते हुए रंग के बिंदुओं वाली बिंदुचित्रकारी का विकास किया।

संकेतवाद (1880 ई. का दशक)
संकेतवाद शैली का उदय 1880 के दशक में चित्रकारी में प्रकृतिवादी प्रवृत्तियों, भौतिकवादी मूल्यों और औद्योगिक क्रांति के खिलाफ हुआ। मोरियू और रेडॉन जैसे संकेतवादी चित्रकारों ने प्रभाववाद की प्राकृतिक बिम्बसृष्टि को खारिज करते हुए फंतासी और स्वप्नों की दुनिया में शरण ली।

क्यूबिस्ट शैली (20वीं शताब्दी का आरंभिक काल)
1907 में पाबलो पिकासो ने अपनी प्रसिद्ध कृति च् लेस डिमॉयसेलेस डि एविग्नॉनज् का पेरिस में प्रदर्शन किया जिससे क्यूबिस्ट आंदोलन की आधारशिला रखी गई। यह शैली इस मायने में अनूठी थी कि इसने पारंपरिक प्राकृतिकवादी चित्रण और सौंदर्यात्मक मूल्यों के खिलाफ पूरी तरह से विद्रोह कर दिया। इस शैली में चित्रों को घन के आकार में बनाया जाता था।

अभिव्यंजनावाद (20वीं शताब्दी का आरंभिक काल)
वैसिली कैडिस्की इस शैली का सबसे पहला चित्रकार माना जाता है। इस शैली के कलाकारों ने मानवीय संवेदनाओं और अंतर्दृष्टि पर विशेष जोर दिया।

दादावाद (1914 ई. से)
पिकाबिया और ड्यूचैम्प ने चित्रकारी में अराजकतावादी तत्वों का समावेश किया जिसमें पूरी तरह से परंपरागत मूल्यों के खिलाफ विद्रोह की भावना थी।

जादुई यथार्थवाद (1927 से-)
दादावाद के कोख से ही जादुई यथार्थवाद का जन्म हुआ। डॉली, मेगिरेट्टे और तांगाय जैसे चित्रकारों ने अपने चित्र बनाने के लिए अचेतन स्रोतों का सहारा लिया। वे फ्रायड के मनोविश्लेषण से काफी हद तक प्रभावित थे।

अमूर्त प्रभाववाद (1940 का दशक)
अमूर्त प्रभाववाद पर हेनरी माटिस्से, पाब्लो पिकासो और क्यूबिस्ट शैली का प्रभाव था। इस शैली के चित्रों में शुद्ध अमूर्तता का समावेश किया गया। कुछ आलोचक इसे अराजकतावादी शैली मानते थे।

पॉप शैली (1950-1960 ई.)
पॉप शैली में व्यावसायिक तकनीक का प्रयोग किया गया। इस शैली के मुख्य चित्रकार रिचर्ड हेमिल्टन, डेविड हाम्नी, जैस्पर जॉन्स और वारहॉल थे।

ग्रेफेटी शैली (1970-1980)
अमेरिका में ग्रेफेटी शैली का विकास शहरी लोककला के रूप में हुआ। इस शैली के मुख्य कलाकार कीथ हेरिंग और जीन मिचेल बास्क्वाट थे।

भारतीय चित्रकला

भारतीय चित्रकारी के प्रारंभिक उदाहरण प्रागैतिहासिक काल के हैं, जब मानव गुफाओं की दीवारों पर चित्रकारी किया करता था। भीमबेटका की गुफाओं में की गई चित्रकारी 5500 ई.पू. से भी ज्यादा पुरानी है। 7वीं शताब्दी में अजंता और एलोरा गुफाओं की चित्रकारी भारतीय चित्रकारी का सर्वोत्तम उदाहरण हैं।
भारतीय चित्रकारी में भारतीय संस्कृति की भांति ही प्राचीनकाल से लेकर आज तक एक विशेष प्रकार की एकता के दर्शन होते हैं। प्राचीन व मध्यकाल के दौरान भारतीय चित्रकारी मुख्य रूप से धार्मिक भावना से प्रेरित थी, लेकिन आधुनिक काल तक आते-आते यह काफी हद तक लौकिक जीवन का निरुपण करती है। आज भारतीय चित्रकारी लोकजीवन के विषय उठाकर उन्हें मूर्त कर रही है।

भारतीय चित्रकारी की शैलियां
भारतीय चित्रकारी को मोटे तौर पर भित्ति चित्र व लघु चित्रकारी में विभाजित किया जा सकता है। भित्ति चित्र गुफाओं की दीवारों पर की जाने वाली चित्रकारी को कहते हैं, उदाहरण के लिए अजंता की गुफाओं व एलोरा के कैलाशनाथ मंदिर का नाम लिया जा सकता है। दक्षिण भारत के बादामी व सित्तानवसाल में भी भित्ति चित्रों के सुंदर उदाहरण पाये गये हैं। लघु चित्रकारी कागज या कपड़े पर छोटे स्तर पर की जाती है। बंगाल के पाल शासकों को लघु चित्रकारी की शुरुआत का श्रेय दिया जाता है।

अजंता की गुफाएं
इन गुफाओं का निर्माणकार्य लगभग 1000 वर्र्षों तक चला। अधिकांश गुफाओं का निर्माण गुप्तकाल में हुआ। अजंता की गुफाएं बौद्ध धर्म की महायान शाखा से संबंधित हैं।

एलोरा की गुफाएं
हिंदू गुफाओं में सबसे प्रमुख आठवीं सदी का कैलाश मंदिर है। इसके अतिरिक्त इसमें जैन व बौद्ध गुफाएं भी हैं।

बाघ व एलीफेटा की गुफाएं
बाघ की गुफाओं के विषय लौकिक जीवन से सम्बन्धित हैं। यहां से प्राप्त संगीत एवं नृत्य के चित्र अत्यधिक आकर्षक हैं।
हाथी की मूर्ति होने की वजह से पुर्तगालियों ने इसका नामकरण एलीफेन्टा किया।

जैन शैली
इसके केद्र राजस्थान, गुजरात और मालवा थे।  देश में जैन शैली में ही सर्वप्रथम ताड़ पत्रों के स्थान पर चित्रकारी के लिए कागज का प्रयोग किया गया। इस कला शैली में जैन तीर्र्थंकरों के चित्र बनाये जाते थे। इस शैली पर फारसी शैली का भी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। नासिरशाह (1500-1510 ई.) के शासनकाल में मांडू में चित्रित नीयतनामा के साथ ही पांडुलिपि चित्रण में एक नया मोड़ आया।

पाल शैली
यह शैली 9-12वीं शताब्दी के मध्य बंगाल के पाल वंश के शासकों के शासनकाल के दौरान विकसित हुई। इस शैली की विषयवस्तु बौद्ध धर्म से प्रभावित थी। दृष्टांत शैली वाली इस चित्रकला शैली ने नेपाल और तिब्बत की चित्रकला को भी काफी प्रभावित किया।

मुगल शैली
मुगल चित्रकला शैली भारतीय, फारसी और मुस्लिम मिश्रण का विशिष्ट उदाहरण है। अकबर के शासनकाल में लघु चित्रकारी के क्षेत्र में भारत में एक नये युग का सूत्रपात हुआ।  उसके काल की एक उत्कृष्ट कृति हमजानामा है। मुगल चित्रकला नाटकीय कौशल और तूलिका के गहरेपन के लिए विख्यात है।
जहांगीर खुद भी एक अच्छा चित्रकार था। उसने अपने चित्रकारों को छविचित्रों व दरबारी दृश्यों को बनाने के लिए प्रोत्साहित किया। उस्ताद मंसूर, अब्दुल हसन और बिशनदास उसके दरबार के सबसे अच्छे चित्रकार थे। शाहजहां के काल में चित्रकारी के क्षेत्र में कोई ज्यादा कार्य नहीं हुआ, क्योंकि वह स्थापत्य व वास्तु कला में ज्यादा रुचि रखता था।


राजपूत चित्रकला शैली
राजपूत चित्रकला शैली का विकास 18वींशताब्दी के दौरान राजपूताना राज्यों के राजदरबार में हुआ। इन राज्यों में विशिष्ट प्रकार की चित्रकला शैली का विकास हुआ, हालांकि इनमें कुछ ऐसे समान तत्व हैं जिसकी वजह से इसका नामकरण राजपूत शैली किया गया। यह शैली विशुद्ध हिंदू परंपराओं पर आधारित है। इस शैली में रागमाला से संबंधित चित्र काफी महत्वपूर्ण हैं। इस शैली में मुख्यतया लघु चित्र ही बनाये गये। राजपूत चित्रकला की एक असाधारण विशेषता आकृतियों का विन्यास है। लघु आकृतियां  भी स्पष्टत: चित्रित की गई हैं। इस शैली का विकास कई शाखाओं में हुआ-

  • मालवा शैली: मालवा शैली अपने चमकीले और गहरे रंगों के कारण विशिष्ट है। मालवा शैली के रंगचित्रों की प्रमुख श्रृंखला रसिकप्रिया है।
  • मेवाड़ शैली: मेवाड़ शैली में पृष्ठभूमि सामान्यत: बेलबूटेदार और वास्तुशिल्प से परिपूर्ण है।
  • बीकानेर शैली: बीकानेरी शैली के अधिकांश कलाकार मुस्लिम थे। यह शैली अपने सूक्ष्म एवं मंद रंगाभास के लिए प्रसिद्ध है।
  • बूंदी शैली: इस शैली में नारी सौंदर्य के चित्रण के लिए कुछ अपने मानदण्ड स्थापित किए गए।
  • कोटा शैली: कोटा शैली काफी हद तक बूंदी शैली से मिलती-जुलती है। इस शैली में विरल वनों में सिंह और चीतों के शिकार के चित्र विश्वविख्यात हैं।
  • आंबेर शैली: आंबेर शैली के रंगचित्र समृद्ध हैं और उनमें विषय वैविध्य भी है लेकिन इसमें सूक्ष्मता का अभाव है।
  • किशनगढ़ शैली: उन्नत ललाट, चापाकार भौंहें, तीखी उन्नत नासिका, पतले संवेदनशील ओंठ तथा उन्नत चिबुक सहित नारी का चित्रण इस शैली का वैशिष्ट्य है।
  • मारवाड़ शैली: इस शैली के रंगचित्रों में पगड़ी की कुछ विशेषताएं हैं। रंग-संयोजन में चमकीले रंगों का प्राधान्य है।
  • पहाड़ी चित्रकला शैली: इस कला के चित्रित वृक्षों की बनावट पर नेपाली चित्रकला का व्यापक प्रभाव है। पहाड़ी चित्रकारों में कृष्ण गाथा अत्यंत लोकप्रिय है। बसौली शैली, गढ़वाल शैली, जम्मू शैली व कांगड़ा शैली पहाड़ी चित्रकला शैली की उप-शैलियां हैं।

बंगाल शैली
चित्रकारी की बंगाल शैली का विकास 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में ब्रिटिश राज के दौरान हुआ। यह भारतीय राष्ट्रवाद से प्रेरित शैली थी, लेकिन इसको कई कला प्रेमी ब्रिटिश प्रशासकों ने भी प्रोत्साहन दिया। रवींद्रनाथ टैगोर के भतीजे अवनींद्रनाथ टैगोर इस शैली के सबसे पहले चित्रकार थे। उन्होंने मुगल शैली से प्रभावित कई खूबसूरत चित्र बनाये। टैगोर की सबसे प्रसिद्ध कृति भारत-माता थी जिसमें भारत को एक हिंदू देवी के रूप में चित्रित किया गया था। 1920 के बाद भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के साथ इस शैली का पतन हो गया।

आधुनिक प्रवृत्ति
औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय कला पर पश्चिमी प्रभाव पूरी तरह से पडऩे लगा था। इस काल के दौरान कई ऐसे चित्रकार हुए जिन्होंने पश्चिमी दृष्टिकोण और यथार्थवाद के वेश में भारतीय विषयों का सुंदर चित्रण किया। इसी दौरान जेमिनी रॉय जैसे कलाकार भी थे जिन्होंने लोककला से प्रेरणा ली।
 भारतीय स्वतंत्रता के बाद प्रगतिशील कलाकारों ने स्वतंत्रोत्तर भारत की आकांक्षाओं को व्यक्त करने के लिए नये विषयों व माध्यमों को चुना। इस समूह के छह प्रमुख चित्रकारों में के.एच. आगा, एस. के. बकरे, एच. ए. गदे, एम. एफ. हुसैन, एस. एच. रजा और एफ. एन. सूजा शामिल थे। इस समूह को 1956 में भंग कर दिया गया लेकिन छोटे से ही समय में इसने भारतीय चित्रकला परिदृश्य को पूरी तरह से बदल दिया।

इस काल की एक प्रसिद्ध चित्रकार अमृता शेरगिल हैं जिन्होंने नवीन भारतीय शैली का सृजन किया। अन्य महान चित्रकारों में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और रवि वर्मा का नाम शामिल है। वर्तमान प्रसिद्ध चित्रकारों में बाल चाब्दा, वी. एस. गाईतोंडे, कृष्णन खन्ना, रामकुमार, तैयब मेहता और अकबर पदमसी शामिल हैं। जहर दासगुप्ता, प्रोदास करमाकर और बिजॉन चौधरी ने भी भारतीय कला व संस्कृति को समृद्ध बनाने में योगदान दिया है।


पश्चिमी नृत्य कला

पश्चिमी नृत्य कला का इतिहास उसकी प्राचीन संस्कृति में निहित है। पश्चिमी देशों में पोलैण्ड, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, स्कैैंडीनेवियाई देश, चेक व स्लोवाकिया, रूस इत्यादि शामिल हैं, जिनमें प्रत्येक की अपनी एक विशिष्ट नृत्य शैली है। विभिन्न संस्कृतियों के मिलन से भी नई नृत्य शैलियों का उद्भव व विकास हुआ।
20वीं शताब्दी की पश्चिमी नृत्यकला में शास्त्रीय बैले के औपचारिक नियमों के खिलाफ प्रतिक्रिया स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इससे मुक्त शैली की नृत्यकला का विकास हुआ। आधुनिक नृत्यों में शो डांसिंग (उदाहरणस्वरूप कैनकैन जिसका विकास 1940 के आसपास पेरिस में हुआ), टैप और जाज डांस (19वीं शताब्दी में अमेरिका में जन्म), फ्री फॉर्म (जिसका प्रतिपादन अमेरिकी इसाडोरा डंकन ने 20वीं शताब्दी की शुरुआत में किया) अथवा आम जनता में लोकप्रिय नृत्य (रॉक एंड रोल अथवा ट्विस्ट) शामिल हैं।

बैले
17वीं शताब्दी में फ्रांस के राजा लुईस चौदहवें द्वारा नृत्यकला में रुचि लेने की वजह से बैले का जन्म हुआ। बैले, नाट्य का नृत्य रूप है जो विभिन्न शारीरिक स्थितियों, कदमों की स्थिति एवं भावप्रवण अंग भंगिमाओं के समन्वय पर आधारित है। इस नृत्य में पैरों को जमीन के सापेक्ष 90 डिग्री पर रखना होता है। बैले में पुरुष व महिला नर्तक अत्यन्त आकर्षक रूप से चक्कर लगाते हैं।

फ्रांसीसी बैले
लुईश चौदहवें के शासनकाल के बाद 1713 में पेरिस ओपेरा की स्थापना की गई जिसमें बैले की शिक्षा दी जाती थी। इस ओपेरा के नर्तक अत्यन्त भारी-भरकम दरबारी वस्त्र पहना करते थे एवं अपने चेहरे पर मुखौटा लगाते थे। सन 1800 के बाद महिला नर्तकियों ने अपने पंजों के किनारों पर नृत्य करना प्रारंभ किया इसे च्ऑन प्वाइंटच् कहा जाता है। धीरे-धीरे पुरुष नर्तकों की भूमिका दोयम दर्जे की हो कर रह गई। वे महिला नर्तकियों के सहयोगी मात्र रह गये।

रूसी बैले
19वीं शताब्दी के अंत में च्स्पीलिंग ब्यूटीÓ और स्वान लेक जैसे बैले नाटकों से रूस में इस कला का प्रचार-प्रसार हुआ। सन 1919 में प्रसिद्ध बैले निर्देशक सर्गे दियघीलेव ने पेरिस में अपनी बैले नाटिका का प्रदर्शन किया जिसे जबर्दस्त लोकप्रियता मिली। इसने रूसी बैले को विश्व भार में लोकप्रियता दिलाई।

आधुनिक बैले
रूस में आज भी बैले के रूडोल्फ नूरेयेव व मिखाइल बेरीशनिकोव जैसे महान कलाकार हैं। लेकिन कई अन्य देशों में भी नवीन तकनीक का समावेश करते हुए कई परीक्षण किये जा रहे हैं।

विश्व के प्रमुख नृत्य
नृत्य देश
 टैंगो  अर्र्जेंटीना
 साम्बा  ब्राजील
 चा-चा  कैरेबियाई द्वीप समूह
  कोंगा,माम्बो, रूम्बा   क्यूबा
   हॉर्नपाइप  इंग्लैंड
 कॉनकॉन, निगुबेट  फ्रांस
 वाल्ट्ज  जर्मनी
 जिग, फेडिंग  आयरलैंड
 होरा  इजरायल
  टारनटेला  इटली
  पोल्का, शोटिश  मध्य यूरोपीय देश
 हाईलैंड फ्लिंग, जिग  स्कॉटलैंड
 बोलेरो, फंडानगो,फ्लेमेन्को   स्पेन
  फाक्सट्राट, चाल्र्सटन   सं. रा.
लिंडी डांस, स्क्वायर डांस अमेरिका

भारतीय नृत्य कला

 

हड़प्पा सभ्यता में नृत्य करती हुई लड़की की मूर्ति पाई गई है, जिससे साबित होता है कि इस काल में ही नृत्यकला का विकास हो चुका था। भरत मुनि का नाट्य शास्त्र नृत्यकला का सबसे प्रथम व प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है। इसको पंचवेद भी कहा जाता है।
नाट्यशास्त्र के सिद्धांत के अनुसार नृत्य दो तरह का होता है- मार्गी (तांडव) तथा लास्य। तांडव नृत्य भगवान शंकर ने किया था। यह नृत्य अत्यंत पौरुष और शक्ति के साथ किया जाता है। दूसरी ओर लास्य एक कोमल नृत्य है जिसे भगवान कृष्ण गोपियों के साथ किया करते थे।
एक काल में भारत में नृत्य काफी प्रचलित थे। लेकिन 19वीं शताब्दी तक आते-आते इनका पूरी तरह से पराभाव हो गया। किंतु 20वीं शताब्दी में कई लोगों के प्रयास से नृत्यकला को पुनर्जीवन मिला।

भरतनाट्यम
भरत मुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित भरतनाट्यम अत्यंत परंपराबद्ध तथा शैलीनिष्ठ है। इस नृत्य शैली का विकास दक्षिण भारत के तमिलनाडु में हुआ। प्रारंभ में यह नृत्य मंदिरों में देवदासियों द्वारा किया जाता था, तब इसे आट्टम और सदिर करते थे। इसे वर्तमान रूप प्रदान करने का श्रेय तंजौर चतुष्टय अर्थात पौन्नैया,पिल्लै तथा उनके बंधुओं को है। 20वीं शताब्दी में इसे रवीन्द्रनाथ टैगोर, उदयशंकर और मेनका जैसे कलाकारों के संरक्षण में यह नाट्यकला पुनर्जीवित हो गई।
भरतनाट्यम में पैरों को लयबद्ध तरीके से जमीन में पटका जाता है, पैर घुटने से विशेष रूप से झुके होते हैं एवं हाथ, गर्दन और कंधे विशेष प्रकार से गतिमान होते हैं।
रुक्मिणी देवी अरुण्डेल भारत की सबसे पहली प्रख्यात नृत्यांगना हुई हैं। अन्य प्रमुख कलाकारों में यामिनी कृष्णमूर्ति, सोनल मानसिंह, मृणालिनी साराभाई, मालविका सरकार शामिल हैं।


 

कुचिपुड़ी
आंध्र प्रदेश के कुचेलपुरम नामक ग्राम में इस नृत्य शैली का उद्भव हुआ। यह शास्त्रीय नृत्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के नियमों का पालन करता है। इस शैली का विकास तीर्थ नारायण तथा सिद्धेन्द्र योगी ने किया। यह मूलत: पुरुषों का नृत्य है, पर इधर कुछ समय से महिलाओं ने भी इसे अपनाया है। इस नृत्य के लिए कर्नाटक संगीत का प्रयोग किया जाता है और इसका प्रदर्शन रात में होता है। कुचिपुड़ी के प्रमुख कलाकारों में वेदांतम सत्यनारायण, वेम्पत्ति चेन्नासत्यम, यामिनी कृष्णमूर्ति, राधा रेड्डी, राजा रेड्डी आदि शामिल हैं।


ओडिसी
भरतमुनि की नृत्य शैली पर आधारित इस शास्त्रीय नृत्य शैली का उद्भव व विकास दूसरी शताब्दी ई.पू. में उड़ीसा के राजा खारवेल के शासनकाल के दौरान हुआ। 12वीं शताब्दी के बाद वैष्णव धर्म से यह काफी प्रभावित हुई और जयदेव द्वारा रचित अष्टपदी इसका एक आवश्यक अंग बन गई।
ओडिसी में सबसे महत्वपूर्ण तत्व च्भंगीज् और च्कर्णज् होते हैं। इसमें विभिन्न शारीरिक भंगिमाओं में शरीर की साम्यावस्था का अत्यन्त महत्व होता है।
आधुनिककला में ओडिसी के पुनरुत्थान का श्रेय केलूचरण महापात्र को है। संयुक्ता पाणिग्राही, सोनल मानसिंह, मिनाती दास, प्रियवंदा मोहंती आदि ओडिसी की प्रसिद्ध नृत्यांगना हैं।

कत्थक
उत्तर भारत का यह शास्त्रीय नृत्य मूलत: भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित है। इसका उद्भव वैदिक युग से माना जाता है। बाद में मुस्लिम शासकों के दौरान यह नृत्य शैली मंदिरों से निकलकर राजदरबारों में पहुँच गई। जयपुर, बनारस, राजगढ़ तथा लखनऊ इसके मुख्य केेंद्र थे। लखनऊ के  वाजिद अली शाह के काल में यह कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई।
यह अत्यंत नियमबद्ध एवं शुद्ध शास्त्रीय नृत्य शैली है, जिसमें पूरा ध्यान लय पर दिया जाता है। इस नृत्य में पैरों की थिरकन पर विशेष जोर दिया जाता है। इसके प्रसिद्ध कलाकार हैं- लच्छू महराज, शम्भू महराज, बिरजू महराज, सितारा देवी, गोपीकृष्ण, शोभना नारायण, मालविका सरकार इत्यादि।

कथकली
केरल राज्य में जन्मी यह नृत्य शैली भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर आधारित है। कथकली भी मंदिरों से जुड़ा नृत्य है और इसे मात्र पुरुष ही करते हैं।
कथकली नृत्य में गति अत्यन्त उत्साहपूर्ण और भड़कीली होती है। इसके साथ इसमें शारीरिक भाव-भंगिमाओं का विशेष महत्व होता है। नर्तक अत्यन्त आकर्षक श्रृंगार का प्रयोग करते हैं। कथाओं के पात्र देवता या दानव होते हैं। 20वीं शताब्दी में वल्लाठोल ने इसके पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कथकली के प्रख्यात कलाकारों में गोपीनाथ, रागिनी देवी, उदयशंकर, रुक्मिणी देवी अरुण्डेल, कृष्णा कुट्टी, माधवन आनंद, शिवरमण इत्यादि शामिल हैं।

मणिपुरी
15-16वीं शताब्दी में वैष्णव धर्म के प्रचार-प्रसार की वजह से मणिपुर में इस नृत्य शैली का उद्भव व विकास हुआ। मणिपुरी के विषय मुख्यतया कृष्ण की रासलीला पर आधारित होते हैं। मणिपुरी की सबसे खास बात शरीर की अत्यन्त आकर्षक एवं मृदु गति होती है जो इसे एक विशिष्ट सौंदर्य प्रदान करती है।
1917 में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा इस नृत्य को शांतिनिकेतन में प्रवेश दिलाने के बाद यह पूरे देश में लोकप्रिय हो गया। इसके प्रमुख कलाकार हैं- गुरु अमली सिंह, आतम्ब सिंह, झावेरी बहनें, थम्बल यामा, रीता देवी, गोपाल सिंह इत्यादि।


मोहिनी अट्टम
यह केरल राज्य में प्रचलित देवदासी परंपरा का नृत्य है। 19वीं सदी में भूतपूर्व त्रावणकोर के महाराजा स्वाति तिरुनाल ने इसे काफी प्रोत्साहन दिया। बाद में कवि वल्लाठोल ने इसका पुनरुत्थान किया। इस नृत्य के प्रमुख कलाकार हैं- कल्याणी अम्मा, भारती शिवाजी, हेमामालिनी इत्यादि।

कृष्णअट्टम
यह नृत्य शैली लगातार आठ रातों तक चलती है और इसमें भगवान कृष्ण के सम्पूर्ण चरित्र का वर्णन किया जाता है। यह केरल में प्रचलित है।

यक्षगान
कर्नाटक में प्रचलित यह मूल रूप से ग्रामीण प्रकृति का नृत्य नाटक है। हिंदू महाकाव्यों से संबंधित इस नृत्य शैली में विदूषक और सूत्रधार मुख्य भूमिका निभाते हैं।

भारतीय शास्त्रीय संगीत

भारतीय शास्त्रीय संगीत की उत्पत्ति वेदों से मानी जाती है। सामवेद में संगीत के बारे में गहराई से चर्चा की गई है। भारतीय शास्त्रीय संगीत गहरे तक आध्यात्मिकता से प्रभावित रहा है, इसलिए इसकी शुरुआत मनुष्य जीवन के अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के साधन के रूप में हुई। संगीत की महत्ता इस बात से भी स्पष्ट है कि भारतीय आचार्र्यों ने इसे पंचम वेद या गंधर्व वेद की संज्ञा दी है। भरत मुनि का नाट्यशास्त्र पहला ऐसा ग्रंथ था जिसमें नाटक, नृत्य और संगीत के मूल सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत को पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा जटिल व संपूर्ण संगीत प्रणाली माना जाता है।


भारतीय शास्त्रीय संगीत की शैलियां
भारतीय शास्त्रीय संगीत की दो प्रमुख शैलियां निम्नलिखित हैं-

हिंदुस्तानी शैली
हिंदुस्तानी शैली के प्रमुख विषय ऋंगार, प्रकृति और भक्ति हैं। तबलावादक हिंदुस्तानी संगीत में लय बनाये रखने में मदद देते हैं। तानपूरा एक अन्य वाद्ययंत्र है जिसे पूरे गायन के दौरान बजाय जाता है। अन्य वाद्ययंत्रों में सारंगी व हरमोनियम शामिल हैं। हिंदुस्तानी शैली पर काफी हद तक फारसी संगीत के वाद्ययंत्रों और शैली दोनों का ही प्रभाव है।

हिंदुस्तानी गायन शैली के प्रमुख रूप

  • ध्रुपद: ध्रुपद गायन की प्राचीनतम एवं सर्वप्रमुख शैली है। ध्रुपद में ईश्वर व राजाओं का प्रशस्ति गान किया जाता है। इसमें बृजभाषा की प्रधानता होती है।
  • खयाल: यह हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की सबसे लोकप्रिय गायन शैली है। खयाल की विषयवस्तु राजस्तुति, नायिका वर्णन, श्रृंगार रस आदि होते हैं।
  • धमार: धमार का गायन होली के अवसर पर होता है। इसमें प्राय: कृष्ण-गोपियों के होली खेलने का वर्णन होता है।
  • ठुमरी: इसमें नियमों की अधिक जटिलता नहीं दिखाई देती है। यह एक भावप्रधान तथा चपल चाल वाला श्रृंगार प्रधान गीत है। इस शैली का जन्म अवध के नवाब वाजिद अली शाह के राज दरबार में हुआ था।
  • टप्पा: टप्पा हिंदी मिश्रित पँजाबी भाषा का श्रृंगार प्रधान गीत है। यह गायन शैली चंचलता व लच्छेदार तान से युक्त होती है।

 

कर्नाटक शैली
कर्नाटक शास्त्रीय शैली में रागों का गायन अधिक तेज और हिंदुस्तानी शैली की तुलना में कम समय का होता है। त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितार और श्यामा शास्त्री को कर्नाटक संगीत शैली की त्रिमूर्ति कहा जाता है, जबकि पुरंदर दास को अक्सर कर्नाटक शैली का पिता कहा जाता है। कर्नाटक शैली के विषयों में पूजा-अर्चना, मंदिरों का वर्णन, दार्शनिक चिंतन, नायक-नायिका वर्णन और देशभक्ति शामिल हैं।

कर्नाटक गायन शैली के प्रमुख रूप

  • वर्णम: इसके तीन मुख्य भाग पल्लवी, अनुपल्लवी तथा मुक्तयीश्वर होते हैं। वास्तव में इसकी तुलना हिंदुस्तानी शैली के ठुमरी के साथ की जा सकती है।
  • जावाली: यह प्रेम प्रधान गीतों की शैली है। भरतनाट्यम के साथ इसे विशेष रूप से गाया जाता है। इसकी गति काफी तेज होती है।
  • तिल्लाना: उत्तरी भारत में प्रचलित तराना के समान ही कर्नाटक संगीत में तिल्लाना शैली होती है। यह भक्ति प्रधान गीतों की गायन शैली है।

गुफा स्थापत्य

भारत में सर्वप्रथम मानव निर्मित गुफाओं का निर्माण दूसरी शताब्दी ई.पू. के आसपास हुआ था।

अजंता की गुफा:

अजंता की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित हैं। इनका सर्वप्रथम जिक्र चीनी तीर्थयात्री ह्वेन सांग ने भी किया था। 1819 ई. में इन गुफाओं को एक ब्रिटिश ऑफिसर ने खोजा था। अजंता की गुफाओं में की गई चित्रकारी भारतीय कला के इतिहास में अद्वितीय है। इन चित्रों में मुख्य रूप से भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित घटनाओं का चित्रण किया गया है।
ऐलीफेटा की गुफा: यह गुफाएं 6वीं शताब्दी की है। ऐलीफेेंटा का शिव मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है।

भीमबेटका गुफाएं:

भीमबेटका की गुफाएं मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित हैं। इनकी खोज 1958 में वी. एस. वाकेनकर ने की थी। इन्हें प्रागैतिहासिक कला का सबसे बड़ा स्थान माना जाता है।

कार्ला व भाजा गुफाएं:

पूणे से लगभग 60 किमी. दूर शैलकृत बौद्ध गुफाएं स्थित हैं जो पहली व दूसरे ई.पू. की हैं। इन गुफाओं में कई विहार व चैत्यों का निर्माण किया गया था।

राजपूतकालीन स्थापत्य कला:

राजपूत कला व स्थापत्य के संरक्षक थे। उनका यह प्रेम उनके किलों व महलों में पूरी तरह से दिखाई देता है। चित्तौड़ व ग्वालियर के किले सबसे पुराने संरक्षित किलों में से एक हैं। ग्वालियर के मन मंदिर महल का निर्माण राजा मानसिंह तोमर (1486-1516) ने कराया था। जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, उदयपुर और कोटा के महल राजपूतकालीन कला की परिपक्वता को दर्शाते हैं। इन महलों का निर्माण मुख्य रूप से 17वीं व 18वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में हुआ था। अधिकांश महलों का निर्माण स्थानीय पीले-भूरे रंग के पत्थरों से किया गया था और आज भी ये पूरी तरह से सुरक्षित हैं।
गुलाबी शहर जयपुर का निर्माण 1727 ई. में राजा जय सिंह ने करवाया था। इसमें राजपूत स्थापत्य कला के चरमोत्कर्ष के दर्शन होते हैं। राजा जय सिंह द्वितीय द्वारा निर्मित पांच वेधशालाओं में से दिल्ली का जंतर मंतर राजपूत स्थापत्य की विशिष्ट कृति है।

जैन स्थापत्य शैली:

प्रारंभिक वर्र्षों में कई जैन मंदिरों का निर्माण बौद्ध शैलकृत शैली के आधार पर बौद्ध मंदिरों के आसपास किया गया। प्रारंभ में जैन मंदिरों को पूरी तरह से पहाड़ों से काट कर ही बनाया जाता था और ईंट का प्रयोग लगभग न के बराबर होता था। लेकिन बाद के काल में जैन शैली में परिवर्तन आया और पत्थर और ईंटों से मंदिरों का निर्माण शुरु हो गया।
कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान के जैन मंदिर विश्व विख्यात हैं। राजस्थान में माउंट आबू और रानकपुर के मंदिर विशेष रूप से अपनी स्थापत्य कला के लिए मशहूर हैं। देवगढ़ (ललितपुर, उत्तर प्रदेश), एलोरा, बादामी और आईहोल में भी जैन स्थापत्य और वास्तुकला के कई बेहतरीन उदाहरण पाये जाते हैं।

इंडो-इस्लामिक स्थापत्य व वास्तुकला:

सल्तनत काल में कला के क्षेत्र में भारतीय और इस्लामी शैलियों के सुंदर समन्वय से इण्डो-इस्लामिक शैली का विकास हुआ। इस काल की स्थापत्य कला की मुख्य विशेषता थी किलों, मकबरों, गुंबदों तथा संकरी और ऊँची मीनारों का प्रयोग। इमारतों की साज-सज्जा के लिए जीवित वस्तुओं के चित्र के स्थान पर फूल-पत्तियों, ज्यामितीय आकृतियों एवं कुरान की आयतें खुदवाई जाती थीं।
तुर्क शासकों द्वारा भारत में बनवाया गया प्रथम स्थापत्य कला का नमूना कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद है। इसका निर्माण गुलाम वंश के प्रथम शासक कुतुबद्दीन ऐबक ने दिल्ली विजय की स्मृति में कराया था। इस काल की सर्वोत्तम इमारत कुतुब मीनार है।

मुगल स्थापत्य व वास्तुकला:

मुगलकालीन स्थापत्य व वास्तुकला भारतीय सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कला प्रेमी मुगल सम्राटों ने ईरानी और हिंदू शैली के समन्वय से मुगल शैली का निर्माण किया।
अकबर ने हुमायूँ के मकबरे का निर्माण फारसी शैली के अनुसार करवाया था। फतेहपुर सीकरी का निर्माण भी अकबर ने करवाया था। इसमें ईरानी तथा प्राचीन भारतीय बौद्ध वास्तुकला की शैली को अपनाया गया। यहाँ की सर्वोच्च इमारत बुलंद दरवाजा है, जिसकी ऊँचाई भूमि से 176 फीट है। जहाँगीर का काल स्थापत्य कला की दृष्टि से काफी सामान्य रहा। उसके द्वारा निर्मित सिकंदरा में स्थित अकबर का मकबरा काफी प्रसिद्ध है। एत्मादुद्दौला के मकबरे का यह महत्व है कि इसमें सबसे पहले संगमरमर के ऊपर पच्चीकारी का काम किया गया था।
शाहजहाँ का काल मुगल स्थापत्य कला का स्वर्ण युग था। उसके काल की प्रमुख इमारतें दिल्ली का लाल किला, रंग महल, दीवाने बहिश्त, शीशमहल, अंगूरी बाग, आगरा की मोती मस्जिद और विश्वविख्यात ताजमहल हैं। ताजमहल का निर्माण सफेद संगमरमर से किया गया और उसकी दीवारों पर कीमती पत्थरों की सुंदर नक्काशी की गई। शाहजहाँ के बाद मुगल वास्तु एवं स्थापत्य कला का पतन हो गया।

अंग्रेजी काल:

यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियाँ भारत में अपने साथ यूरोपीय वास्तु व स्थापत्य कला भी लाईं। उन्होंने भारत में कई ऐसी इमारतों का निर्माण कराया जिनमें नव्य शास्त्रीय, रोमांसक्यू, गोथिक व नवजागरण शैलियों का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। भारत में सबसे पहले पुर्तगालियों का प्रवेश हुआ जिन्होंने गोवा में कई चर्र्चों का निर्माण कराया जिनमें पुर्तगाली-गोथिक शैली की झलक दिखाई देती है। 1530 में गोवा में निर्मित सेंट फ्रांसिस चर्च देश में यूरोपीयों द्वारा बनवाया पहला चर्च माना जाता है।
भारतीय स्थापत्य कला पर सबसे ज्यादा प्रभाव ब्रिटेन का पड़ा। उन्होंने स्थापत्य कला का उपयोग शक्ति प्रदर्शन के लिए किया। भारत के ब्रिटिश शासकों ने गोथिक, इम्पीरियल, क्रिश्चियन, इंग्लिश नवजागरण और विक्टोरियन जैसी कई यूरोपीय शैलियों की इमारतों का निर्माण कराया। अंग्रेजों द्वारा भारत में अपनाई गई शैली को इंडो-सारासेनिक शैली कहते हैं। यह शैली हिंदू, इस्लामिक, और पश्चिमी तत्वों का खूबसूरत मिश्रण थी। मुंबई में अंग्रेजों द्वारा बनवाया गया विक्टोरिया टर्मिनल इसका सबसे सुंदर उदाहरण है।
नई दिल्ली के स्थापत्य व वास्तु कला को अंग्रेजी राज का चरमोत्कर्ष माना जा सकता है। अंग्रेजों ने इस शहर का निर्माण अत्यंत ही योजनबद्ध तरीके से करवाया था। सर एडवर्ड लुटयंस इस शहर के प्रमुख वास्तुकार थे।


स्वतंत्रोत्तर काल:

स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत में स्थापत्य कला की दो शैलियां उभर कर सामने आईं- पुनरुत्थानवादी व आधुनिकतावादी। पुनरुत्थानवादियों ने मुख्य रूप से अंग्रेजी शैली को ही अपनाया जिसकी वजह से वे स्वतंत्र भारत में अपनी कोई छाप नहीं छोड़ सके। आधुनिकवादियों ने भी किसी नई शैली का विकास करने की बजाय अंगे्रजी व अमेरिकी मॉडलों को ही अपनाने पर जोर दिया। इन दोनों मॉडलों ने ही भारत में विविधता और जरूरतों पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया।
लि कॉर्बुसियर द्वारा डिजाइन किये गये चंडीगढ शहर को स्वतंत्र भारत में भारतीय स्थापत्य का सबसे सफल नमूना माना जा सकता है।
हाल के दिनों पश्चिमी देशों में भी आधुुनिकतावाद का मर्सिया पढ़ा जा चुका है जिसकी वजह से अब भारतीय स्थापत्यकार भी भारतीय जड़ों को तलाश कर रहे हैं। हालांकि इस क्षेत्र में आज भी भ्रम की स्थिति है।


भारतीय स्थापत्य कला की मुख्य शैलियाँ

नागर शैली: नागर शैली में मंदिरों का निर्माण चौकोर या वर्गाकार रूप में किया जाता था। प्रमुख रूप से उत्तर भारत में इस शैली के मंदिर पाये जाते हैं। इसी के साथ-साथ एक ओर बंगाल और उड़ीसा, दूसरी ओर गुजरात और महाराष्ट्र तक इस शैली के उदाहरण मिलते हैं।

द्रविड़ शैली: द्रविड़ शैली के मंदिर कृष्णा नदी से लेकर कन्या कुमारी तक पाये जाते हैं। इसमें गर्भगृह के ऊपर का भाग सीधा पिरामिडनुमा होता है। उनमें अनेक मंजिले पाई जाती हैं। आंगन के मुख्य द्वार को गोपुरम कहते हैं। यह इतना ऊँचा होता है कि कई बार यह प्रधान मंदिर के शिखर तक को छिपा देता है। द्रविड़ शैली के मंदिर कभी-कभी इतने विशाल होते हैं कि वे एक छोटे शहर लगने लगते हैं।

बेसर शैली: नागर और द्रविड़ शैलियों के मिले-जुले रूप को बेसर शैली कहते हैं। इस शैली के मंदिर विंध्याचल पर्वत से लेकर कृष्णा तक पाये जाते हैं। बेसर शैली को चालुक्य शैली भी कहते हैं। चालुक्य तथा होयसल कालीन मंदिरों की दीवारों, छतों तथा इसके स्तंभों द्वारों आदि का अलंकरण बड़ा सजीव तथा मोहक है।

भारतीय स्थापत्य कला और मूर्तिकला

भारत में स्थापत्य व वास्तुकला की उत्पत्ति हड़प्पा काल से माना जाता है। स्थापत्य व वास्तुकला के दृष्टिकोण से हड़प्पा संस्कृति तत्कालीन संस्कृतियों से काफी ज्यादा आगे थी। भारतीय स्थापत्य एवं वास्तुकला की सबसे खास बात यह है कि इतने लंबे समय के बावजूद इसमें एक निरंतरता के दर्शन मिलते हैं। इस मामले में भारतीय संस्कृति अन्य संस्कृतियों से इतर है।

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता या हड़प्पा सभ्यता का काल 3500-1500 ई.पू. तक माना जाता है। इसकी गिनती विश्व की चार सबसे पुरानी सभ्यताओं में किया जाता है। हड़प्पा की नगर योजना इसका एक जीवंत साक्ष्य है। नगर योजना इस तरह की थी कि सड़केें एक-दूसरे को समकोण में काटती थीं। हड़प्पा व मोहनजोदड़ो इस सभ्यता के प्रमुख नगर थे। यहां की इमारतें पक्की ईंटों की बनाई जाती थीं। यह एक ऐसी विशेषता है जो तत्कालीन किसी अन्य सभ्यता में नहीं पाई जाती थी। मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत उसका स्नानागार था। घरों के निर्माण में पत्थर और लकड़ी का भी प्रयोग किया जाता था।

मोहनजोदड़ो से मिली मातृ देवी, नाचती हुई लड़की की धातु की मूर्ति इत्यादि तत्कालीन उत्कृष्ट मूर्तिकला के अनुपम उदाहरण हैं।


मौर्यकाल:

मौर्यकाल के दौैरान देश में कई शहरों का विकास हुआ। मौर्यकाल भारतीय कलाओं के विकास के दृष्टिकोण से एक युगांतकारी युग था। इस काल के स्मारकों व स्तंभों को भारतीय कला के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जाता है। इस काल के स्थापत्य में लकड़ी का काफी प्रयोग किया जाता था। अशोक के समय से भवन निर्माण में पत्थरों का प्रयोग प्रारंभ हो गया था। ऐसा माना जाता है कि अशोक ने ही श्रीनगर (कश्मीर) व ललितपाटन(नेपाल) नामक नगरों की स्थापना की थी। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अशोक ने अपने राज्य में कुल 84,000 स्तूपों का निर्माण कराया था। हालांकि इसको अतिश्योक्ति माना जा सकता है। स्थापत्य के दृष्टिकोण से सांची, भारहुत, बोधगया, अमरावती और नागार्जुनकोंडा के स्तूप प्रसिद्ध हैं। अशोक ने 30 से 40 स्तम्भों का निर्माण कराया था। अशोक के समय से ही भारत में बौद्ध स्थापत्य शैली की शुरुआत हुई। इस काल के दौरान गुफाओं, स्तम्भों, स्तूपों और महलों का निर्माण कराया गया। अशोक के स्तम्भों से तत्कालीन भारत के विदेशों से संबंधों का खुलासा होता है। पत्थरों पर पॉलिश करने की कला इस काल में इस स्तर पर पहुँच गई थी कि आज भी अशोक की लाट की पॉलिश शीशे की भांति चमकती है। मौर्यकालीन स्थापत्य व वास्तुकला पर ग्रीक, फारसी और मिस्र संस्कृतियों का पूरी तरह से प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
परखम में मिली यक्ष की मूर्ति, बेसनगर की मूर्ति, रामपुरवा स्तम्भ पर बनी साँड की मूर्ति तथा पटना और दीदारगंज की मूर्तियां विशेष रूप से कला के दृष्टिकोण से अद्वितीय हैं।

शुंग, कुषाण और सतवाहन:

232 ई.पू. में अशोक की मृत्यु के थोड़े काल पश्चात ही मौर्य वंश का पतन हो गया। इसके बाद उत्तर भारत में शुंग और कुषाण वंशों और दक्षिण में सतवाहन वंश का शासनकाल आया। इस समय के कला स्मारक स्तूप, गुफा मंदिर (चैत्य), विहार, शैलकृत गुफाएं आदि हैं। भारहुत का प्रसिद्ध स्तूप का निर्माण शुंग काल के दौरान ही पूरा हुआ। इस काल में उड़ीसा में जैनियों ने गुफा मंदिरों का निर्माण कराया। उनके नाम हैं- हाथी गुम्फा, रानी गुम्फा, मंचापुरी गुम्फा, गणेश गुम्फा, जय विजय गुम्फा, अल्कापुरी गुम्फा इत्यादि। अजंता की कुछ गुफाओं का निर्माण भी इसी काल के दौरान हुआ। इस काल के गुफा मंदिर काफी विशाल हैं।
इसी काल के दौरान गांधार मूर्तिकला शैली का भी विकास हुआ। इस शैली को ग्रीक-बौद्ध शैली भी कहते हैं। इस शैली का विकास कुषाणों के संरक्षण में हुआ। गांधार शैली के उदाहरण हद्दा व जैलियन से मिलते हैं। गांधार शैली की मूर्तियों में शरीर को यथार्थ व बलिष्ठ दिखाने की कोशिश की गई है। इसी काल के दौरान विकसित एक अन्य शैली-मथुरा शैली गांधार से भिन्न थी। इस शैली में शरीर को पूरी तरह से यथार्थ दिखाने की तो कोशिश नहीं की गई है, लेकिन मुख की आकृति में आध्यात्मिक सुख और शांति पूरी तरह से झलकती है।
सतवाहन वंश ने गोली, जग्गिहपेटा, भट्टीप्रोलू, गंटासाला, नागार्जुनकोंडा और अमरावती में कई विशाल स्तूपों का निर्माण कराया।

गुप्तकालीन वास्तु व स्थापत्य:

गुप्तकाल के दौरान स्थापत्य व वास्तु अपने चरमोत्कर्ष पर था। इस काल के मंदिरों का निर्माण ऊँचे चबूतरों पर पत्थर एवं ईंटों से किया जाता था। गुप्तकालीन मंदिरों के सबसे भव्य और महत्वपूर्ण मंदिर देवगढ़ (झाँसी के पास) और भीतरगांव (कानपुर) हैं। इन मंदिरों में रामायण, महाभारत और पुराणों से विषय-वस्तु ली गई है। भीतरगांव (कानपुर) का विष्णु मंदिर ईंटों का बना है और नक्काशीदार है।
गुप्तकाल की अधिकांश मूर्तियाँ हिंदू-देवताओं से संबंधित हैं। शारीरिक नग्नता को छिपाने के लिए गुप्तकाल के कलाकारों ने वस्त्रों का प्रयोग किया। सारनाथ में बैठे हुए बुद्ध की मूर्ति और सुल्तानगंज में बुद्ध की तांबे की मूर्ति उल्लेखनीय हैं। विष्णु की प्रसिद्ध मूर्ति देवगढ़ के दशावतार मंदिर में स्थापित है।

चोलकाल:

चोलों ने द्रविड़ शैली को विकसित किया और उसको चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। राजाराज प्रथम द्वारा बनाया गया तंजौर का शिव मंदिर, जिसे राजराजेश्वर मंदिर भी कहा जाता है, द्रविड़ शैली का उत्कृष्ट नमूना है। इस काल के दौरान मंदिर के अहाते में गोपुरम नामक विशाल प्रवेश द्वार का निर्माण होने लगा। प्रस्तर मूर्तियों का मानवीकरण चोल मूर्तिकारों की दक्षिण भारतीय कला को महान देन थी। चोल काँस्य मूर्तियों में नटराज की मूर्ति सर्वोपरि है।

आधुनिक काल


यूरोपीय स्थापत्य कला में 1900 के आसपास का समय भारी परिवर्तन का युग था। इस काल के दौरान कई ऐसी इमारतों का निर्माण किया गया जिसकी विशेषताएं समान थीं। इन निर्माणों में रूप-रंग में सरलता के दर्शन होते हैं और अलंकरण भी नाम-मात्र का है। 1940 के दशक तक आते-आते आधुनिक शैली में और भी मजबूती आई और इसे अंतर्राष्ट्रीय शैली का नाम दे दिया गया और पूरी दुनिया में इस शैली का दबदबा हो गया। इंस्टीट्यूट्स और कार्पोरेट ऑफिसों की इमारतों में विशेष रूप से इस शैली का प्रयोग किया गया। यह क्रम 20वीं शताब्दी में कई दशकों तक जारी रहा। आधुनिक स्थापत्य की विशिष्ट विशेषताओं और उद्भव को लेकर आज भी ब्याख्या व वाद-विवाद जारी है।

वृत्तिवाद (Functionalism):

स्थापत्यकला में वृत्तिवाद एक ऐसा सिद्धांत है जिसके अनुसार किसी स्थापत्यकार को किसी इमारत की डिजाइन उसके उद्देश्य के आधार पर तैयार करना चाहिए। इस शैली में उपयोगिता, सौंदर्य और मजबूती-स्थापत्य के तीन प्रमुख लक्ष्य माने गये हैं।

भविष्यवादी स्थापत्य (Futurist):

भविष्यवादी स्थापत्य का उदय 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में हुआ। इस स्थापत्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी लंबी उध्र्वाधर रेखाएं थीं जो गति का निरुपण करती थी। भविष्यवादियों की थीम में तकनीक व हिंसा जैसे विषयों का भी समावेश होता था। इस शैली की स्थापना कवि फिलिप्पो टोम्मासो मेरीनेट्टी ने की थी जिन्होंने इसका पहला मैनीफेस्टो का प्रकाशन किया जिसका टाइटिल मैनीफैस्टो ऑफ फ्यूचरिज्म था। इस शैली में कवि, संगीतकार, कलाकार और स्थापत्यकार शामिल थे।

प्रभाववादी स्थापत्य (Expressionist Architecture):

प्रभाववादी स्थापत्य एक ऐसी स्थापत्य शैली है जिसका विकास 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में उत्तरी यूरोप में हुआ। यह आंदोलन प्रभाववादी विजुअल और परफॉर्र्मिंग कला के समानान्तर शुरू हुआ। प्रथम विश्वयुद्ध में कई प्रभाववादी स्थापत्यकारों ने भाग लिया था जिसका पूरा असर उनकी कला में पूरी तरह से परिलक्षित होती है। उन्होंने युद्ध की विभीषिका को झेलने के साथ-साथ तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल का अनुभव किया था, जिसकी वजह से उनकी स्थापत्य कला में यूटोपिया विचारधारा और तत्कालीन रोमांटिक सोशलिस्ट एजेंडा के दर्शन होते हैं।

ट्यूब स्थापत्य शैली:

1963 से स्काईस्क्रेपर इमारतों की डिजाइन व निर्माण में फ्रेम ट्यूबों का प्रयोग किया जाने लगा। यह पूरी तरह से नई शेैली थी जिसमें फ्रेम ट्यूब एक तीन विमाओं वाला निर्माण होता है जिसमें तीन, चार या अधिक फ्रेम हुआ करते थे। ये फ्रेम आपस में किनारों पर मिले होते हैं जिससे लंबवत ट्यूब के आकार का निर्माण किया जाता था। इस तरह की निर्माण शैली से बड़ी-बड़ी इमारतों का निर्माण आसान हो गया। इस शैली का सबसे प्रथम उदाहरण शिकागो की डेविट-चेस्टनेट अपार्टमेंट बिल्डिंग है जिसका निर्माण 1963 में किया गया था। वल्र्ड ट्रेड टॉवर (सं. रा. अमेरिका) और पेट्रोनास टॉवरों (मलेशिया) का निर्माण ट्यूब स्थापत्य शैली के आधार पर किया गया था।

उत्तर आधुनिक स्थापत्य शैली:

साहित्य व दर्शन के क्षेत्र में उत्तर आधुनिकतावाद की तरह स्थापत्य में भी इसने दस्तक दी। स्थापत्य में इस शैली की शुरुआत 1950 के दशक से मानी जाती है जिसका आज भी प्रभाव स्थापत्य शैली पर पूरी तरह से दिखाई देता है। इस शैली की सबसे खास बात यह है कि आधुनिकता की औपचारिकता का परित्याग करते हुए इसमें अनौपचारिकता को ग्रहण किया गया। इस शैली में एक बार फिर से अलंकरण का प्रयोग किया जाने लगा। न्यूयॉर्क की सोनी बिल्डिंग को इस शैली की प्रतिनिधि इमारत माना जाता है।

डिकंस्ट्रक्टविस्ट स्थापत्य शैली:

स्थापत्य कला में डिकंस्ट्रक्टविज्म का विकास उत्तर आधुनिकता शैली का ही एक रूप है जिसकी शुरुआत 1980 के दशक में हुई। इस शैली की सबसे बड़ी विशेषता इसका गैर-रेखीय होना है। इसमें स्थापत्य कला के स्थापित नियमों के स्थान पर नये नियमों को गढ़ा गया जिससे कलाकार को अपनी कला दिखाने के खूब मौका मिलने लगे।

मध्यकालीन पश्चिमी स्थापत्य कला

 


प्रारंभिक मध्यकाल के दौरान पश्चिमी स्थापत्य कला को प्रारंभिक ईसाई काल व पूर्व-रोमांसक्यू काल में विभाजित किया जा सकता है। इस काल के दौरान दुर्ग मुख्य रूप से लौकिक स्थापत्य के प्रमुख उदाहरण हैं।

रोमांसक्यू:

इस काल के दौरान अधिकांश वास्तुशिल्पी ईसाई भिक्षु हुआ करते थे और रोमन स्थापत्य कला का इस काल की स्थापत्य कला पर पूरा तरह से प्रभाव था। अद्र्धचापाकार मेहराब, लंबी मेहराब और आरपार मेहराब के प्रयोग से इस काल का नाम रोमांसक्यू पड़ा। फ्लोरेंस, इटली का सैन मिनिएटो गिरिजाघर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

गोथिक शैली:

मध्ययुगीन यूरोप में व्यापार में वृद्धि के साथ ही शहरों की संख्य में भी वृद्धि हुई। यहां धनी बैंकरों, व्यापारियों और उद्योगपतियों ने शानो-शौकत के मामले में सामंतों का मुकाबला करना शुरू कर दिया और बड़े-बड़े गिरिजाघरों का निर्माण कराया। अब वास्तुशिल्पियों को मास्टर मेसॉन कहा जाने लगा। नुकीले मेहराब, मेहराबदार छत की डॉट और चाकरूप पुश्ता गोथिक शैली की तीन सबसे बड़ी विशेषताएं थीं। इन तीनों विशेषताओं को यूरोपीय स्थापत्य की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता है। पेरिस के नोत्रे डेम डि (1163) और चाल्र्स गिरिजाघर (1195) को इस शैली का सबसे खूबसूरत उदाहरण माना जाता है।

नवजागरण शैली:

15वीं शताब्दी में यूरोप में पूँजीवाद, शहरों की संख्या में वृद्धि, धनियों की संख्या में वृद्धि और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भावना के जन्म से नवजागरण काल का उदय हुआ। नवजागरण काल के दौरान कलाकारों व विचारकों ने प्राचीन रोमन व ग्रीक सभ्यता की खोज करके उसको पुन: स्थापित किया। नवजागरण काल का सर्वप्रथम उदय इटली में हुआ। इस पुनर्जागरण का प्रभाव समस्त यूरोप के सभी क्षेत्रों में पड़ा। इस काल के कलाकारों में स्थापत्य व मूर्तिकला में बौद्धिकता की झलक साफ दिखाई देती है। कलाकारों ने स्थापत्य कला में प्राचीन रोमन स्थापत्य कला का समावेश किया। इस नई शैली के प्रारंभिक प्रतिनिधि कलाकार फिलिप्पो ब्रूनेलेस्ची और ल्यॉन बतिस्ता अल्बर्टा थे।
सिस्टाइन चैपेल की छत के चित्रकार, डेविड के मूर्तिकार और रोम के सेंट पीटर्स चर्च के गुंबद के स्थापत्यकार माइकेलएंजिलो नवजागरणकाल के प्रतिनिधि पुरुष थे।

सदाचारवाद और बरोक शैली: सदाचारवाद शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कला इतिहासकार, स्थापत्यकार और चित्रकार जिऑर्जियो वासेरी (1511-74) ने लियोनार्डो डि विन्सी, राफेल और माइकेलएंजिलो के कार्र्यों को ब्याख्यायित करने के लिए किया था। यदि नवजागरणकाल के स्थापत्य ने मानव संस्कृति के पुनर्जन्म की घोषणा की तो सदाचारवाद और बरोक शैली ने अर्थ और निरुपण के बारे में बढ़ती हुई चिंता को व्यक्त किया। साइंस और दर्शन के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण विकास की वजह से यथार्थ का गणितीय निरुपण बाकी संस्कृति से पूरी तरह से अलग हो गया। इससे स्थापत्य में दुनिया के बारे में एक विशेष प्रकार की दृष्टि का उदय हुआ। माइकेलएंजिलो ने अपने बाद के जीवन में नवजागरण काल के कड़े नियमों का परित्याग करते हुए सदाचारवाद की शुरुआत की।

बाद में स्थापत्यकार इससे भी आगे गये और 16वीं शताब्दी के अंतिम काल और 17वीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में विग्लोना, बोर्रोमिनी, मडेर्ना और वेरनिनि जैसे कलाकारों ने नवजागरण कला के नियमों में परिवर्तन करते हुए बरोक शैली का विकास किया। रोम का सैन कार्लो चर्च जिसका निर्माण बोर्रोमिनी ने किया था, इसका प्रमुख उदाहरण है।

पश्चिमी स्थापत्य एवं मूर्तिकला

ग्रीक स्थापत्य व मूर्तिकला-

ग्रीक संस्कृति की सबसे खास बात यह थी कि कला व संस्कृति में उसकी दृष्टि काफी हद तक लौकिक थी। उनकी इसी सोच का पूरी तरह से प्रभाव उनके स्थापत्य व मूर्तिकला में परिलक्षित होता है। ग्रीक संस्कृति पर कई बाहरी शक्तियों की सोच का भी पूरा असर था। लगभग 1000 ई.पू. के आसपास ग्रीस पर उत्तर से डोरियन और पूर्व से अयोनियन लोगों ने आक्रमण किया। इन दोनों शक्तियों ने ग्रीक संस्कृति को काफी कुछ सिखाया। डोरियन अपने साथ जहाँ लकड़ी के भवन निर्माण की कला लाये, वहीं अयोनियन अपने साथ अलंकारमय नक्काशी लाये। यह वह काल था जब एथेंस सबसे प्रभावशाली सिटी-स्टेट था। इसी काल में भवन निर्माण में शहतीर का प्रयोग होने लगा। एथेंस का एक्रोपोलिस इस बात का सबसे प्रमुख उदाहरण है। इस भवन का उपयोग प्रशासनिक व धार्मिक कार्र्यों को सम्पन्न करने के लिए किया जाता था।
चौथी शताब्दी ई.पू. के आसपास ग्रीक स्थापत्य व मूर्तिकला ने एक नई शैली कोरिन्थियन को जन्म दिया। यह एक ऐसी शैली थी जिसमें अलंकरण पर काफी ज्यादा जोर दिया जाता था। ग्रीक कलाकारों ने मूर्तिकला में भी अपने हुनर को दिखाया और देवी-देवताओं, नायकों, नायिकाओं आदि की सुंदर मूर्तियों का निर्माण किया। ग्रीक मूर्तिकला की सबसे खास बात मूर्तियों की लौकिकता है। शरीर की आकृतियों को अत्यंत बलिष्ठ और यथार्थ रूप में दिखाने की कोशिश की जाती थी।

 

रोमन शैली-

प्राचीनकाल में रोमन साम्राज्य काफी विशाल था। इस साम्राज्य की विशालता की झलक उसके विशाल भवनों में देखा जा सकता है। रोमन वास्तुशिल्पियों ने सर्वप्रथम चापाकार निर्माण अद्र्ध वृत्ताकार मेहराब का प्रयोग किया। इसका विकास लंबी मेहराब, अनुप्रस्थ मेहराब और गुंबद में हुआ।
रोमन वास्तुशिल्पियों ने मंदिरों और महलों, सार्वजनिक स्नानागारों और व्यायामशालाओं, सर्कसों व वृत्ताकार रंगशालाओं, सड़कों, सेतुओं और सीवर प्रणालियों का खूबसूरती व भव्यता के साथ निर्माण किया। रोमन वास्तु व स्थापत्य की एक खास बात गिरिजाघरों का निर्माण था। गिरिजाघरों का निर्माण सम्राट कांस्टेन्टाइन ने चौथी शताब्दी में शुरु करवाया जब उसने ईसाई धर्म को अपनाया। इसके लिए बेसेलिका को आदर्श बनाया गया। रोमन साम्राज्य में यह एक व्यापारिक हाल हुआ करता था। इसकी एक मुख्य विशेषता एक लंबी, केेंद्रीय पिंडी हुआ करती थी जो दो निचली पीथिकाओं से घिरी रहती थी। आगे चलकर गिरिजाघरों की शैली इससे काफी हद तक प्रभावित हुई।
रोमन कलाकार मूर्तिकला में भी सिद्धहस्त थे। इस मामले में रोमन शैली काफी हद तक ग्रीक शैली से मिलती-जुलती थी। रोमन शैली में भी यथार्थवाद के दर्शन होते हैं। अधिकांश मूर्तियाँ अद्र्ध-प्रतिमाओं के रूप में और घुड़सवारों की हैं। मूर्तियों में शारीरिक चित्रण अत्यंत ही सुंदर है।