भारत में परमाणु ऊर्जा

परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्वक ढंग से उपयोग में लाने हेतु नीतियों को बनाने के लिए 1948 ई. में परमाणु ऊर्जा कमीशन की स्थापना की गई। इन नीतियों को निष्पादित करने के लिए 1954 ई. में परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) की स्थापना की गई।

परमाणु ऊर्जा विभाग के परिवार में पाँच अनुसंधान केंद्र हैं- (i) भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र (BARC)- मुंबई, महाराष्ट्र। (ii) इंदिरा गाँधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (IGCAR)- कलपक्कम, तमिलनाडु। (iii) उन्नत तकनीकी केंद्र (CAT) - इंदौर। (iv) वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रॉन केंद्र (VECC) - कोलकाता। (v) परमाणु पदार्थ अन्वेषण और अनुसंधान निदेशालय (AMD)- हैदराबाद। परमाणु ऊर्जा विभाग सात राष्ट्रीय स्वायत्त संस्थानों को भी आर्थिक सहायता देता है, वे हैं- (i) टाटा फंडामेंटल अनुसंधान संस्थान (TIFR)- मुम्बई। (ii) टाटा स्मारक केंद्र (TMC) - मुंबई। (iii) साहा नाभिकीय भौतिकी संस्थान (SINP)- कोलकाता। (iv) भौतिकी सँस्थान (IOP)- भुवनेश्वर। (v) हरिश्चंद्र अनुसंधान संस्थान (HRI)- इलाहाबाद। (vi) गणितीय विज्ञान संस्थान (IMSs) - चेन्नई और (vii) प्लाज़्मा अनुसंधान संस्थान (IPR)- अहमदाबाद।

नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम (Nuclear Power Programme)- 1940 ई. के दौरान देश के यूरेनियम और बड़ी मात्रा में उपलब्ध थोरियम संसाधनों के प्रयोग के लिए तीन चरण वाले परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम का गठन किया गया। कार्यक्रम के चल रहे पहले चरण में बिजली के  उत्पादन के लिए प्राकृतिक यूरेनियम ईंधन वाले भारी दबाव युक्त पानी रिएक्टर (Pressurised Heavy water reactors) का इस्तेमाल किया जा रहा है। उपयोग में लाए गए ईंधन को जब दुबारा संसाधित किया जाता है तो उससे प्लूटोनियम उत्पन्न होता है जिसका प्रयोग दूसरे चरण में द्रुत ब्रीडर रिएक्टर में विच्छेदित यूरेनियम के साथ ईंधन के रूप में किया जाता है। दूसरे चरण में उपयोग में लाए ईंधन को दुबारा संसाधित करने पर अधिक प्लूटोनियम और यूरोनियम-233 उत्पादित होता है, जब थोरियम का उपयोग आवरण के रूप में किया जाता है। तीसरे चरण के रिएक्टर यूरेनियम-233 का इस्तेमाल करेंगे।

नाभिकीय ऊर्जा केंद्र (Nuclear Power Stations)- अभी देश में 17 परिचालित नाभिकीय ऊर्जा रिएक्टर (दो क्वथन जलयुक्त रिएक्टर - Boiling water reactors और 15 पी एच डब्लू आर एस) हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 4120 मेगावाट इकाई है। भारत में नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र की रूपरेखा, निर्माण और संचालन की क्षमता पूरी तरह तब प्रतिष्ठित हुई जब चेन्नई के पास कालपक्कम में 1984 और 1986 में दो स्वदेशी पी एच डब्ल्यू आर एस की स्थापना की गई। वर्ष 2008 में एनपीसीआईएल के परमाणु संयंत्रों से 15,430 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ।

तारापुर परमाणु विद्युत परियोजना-3 एवं 4 की 540 मेगावाट की इकाई-4 को 5 वर्षों से कम समय में ही मार्च 2005 को क्रांतिक (Critical) किया गया। कैगा 3 एवं 4 का निर्माण प्रगत अवस्था में है तथा कैगा-3 के अधिचालन (commissioning) की गतिविधियाँ शुरू की जा चुकी हैं। इन इकाइयों को 2007 तक पूरा किया जाना है।
तमिलनाडु के कंदुनकुलम में परमाणु ऊर्जा केंद्र की स्थापना करने के लिए भारत ने रूस से समझौता किया। इस केंद्र में दो दबावयुक्त जल रिएक्टर (हर एक की क्षमता 1000 मेगावाट) होंगे।

भारी जल उत्पादन (Heavy Water Production) - भारी जल का इस्तेमाल पी एच डब्ल्यू आर में परिमार्णक और शीतलक के रूप में किया जाता है। भारी जल उत्पादन संयंत्रों की स्थापना निम्नलिखित जगहों पर की गई है-
1.    नांगल (पंजाब), देश का पहला भारी जल संयंत्र जिसकी स्थापना 1962 में की गई; 2. वडोदरा (गुजरात); 3. तालचेर (उड़ीसा); 4. तूतीकोरिन (तमिलनाडु); 5. थाल (महाराष्ट्र); 6. हज़ीरा (गुजरात); 7. रावतभाटा (गुजरात); 8. मानुगुरू (आंध्र प्रदेश)

नाभिकीय ईंधन उत्पादन (Nuclear Fuel Production) - हैदराबाद का नाभिकीय ईंधन कॉम्पलेक्स दबावयुक्त जल रिएक्टर के  लिए आवश्यक ईंधन के तत्वों को तैयार करता है। यह तारापुर के  क्वथन जल (boiling water) रिएक्टर के लिए आयात यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड से संवर्धित यूरेनियम ईंधन के तत्वों का भी उत्पादन करता है।

प्रमुख परमाणु अनुसंधान केंद्र (Main Atomic Research Center)

1. भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (Bhabha Atomic Research Center) - इसको मुंबई के निकट ट्राम्बे में परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान के रूप में 1957 ई.  में स्थापित किया गया और 1967 ई. में इसका नाम बदलकर इसके संस्थापक डा. होमी जहाँगीर भाभा की याद में 'भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर, बार्क' रख दिया गया। नाभिकीय ऊर्जा और उससे जुड़े अन्य विषयों पर अनुसंधान और विकास कार्य करने के लिए यह प्रमुख राष्ट्रीय केंद्र है।

2. इंदिरा गाँधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (Indira Gandhi Atomic Research Center-  IGCAR ) - 1971 ई. में फास्ट ब्रीडर टेक्नोलॉजी के अनुसंधान और विकास के लिए चेन्नई के कालपक्कम में इसकी स्थापना की गई। आई जी सी ए आर ने फास्ट ब्रीडर रिएक्टर एफ बी टी आर को अभिकल्पित किया जो प्लूटोनियम और प्राकृतिक यूरेनियम मूलांश के साथ देशी मिश्रित ईंधन का इस्तेमाल करता है। इससे भारत को अपने प्रचुर थोरियम संसाधनों से परमाणु ऊर्जा उत्पन्न करने में सहायता मिलेगी। इस अनुसंधान केंद्र ने देश का पहला न्यूट्रॉन रिएक्टर 'कामिनी' को भी विकसित किया। ध्रुव, अप्सरा और साइरस का इस्तेमाल रेडियो आइसोटोप तैयार करने के साथ-साथ परमाणु प्रौद्योगिकियों व पदार्थों में शोध, मूल और व्यावहारिक शोध तथा प्रशिक्षण में किया जाता है। भारत आज विश्व का सातवाँ तथा प्रथम विकासशील देश है जिसके पास उत्कृष्ट फास्ट ब्रीडर प्रजनक प्रौद्योगिकी मौजूद है।

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम

उद्देश्य और योजना- राष्ट्रीय विकास के लिए अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रयोग में आत्मनिर्भरता को प्राप्त करना भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का उद्देश्य है। मुख्य क्षेत्र हैं-1. भिन्न राष्ट्रीय अनुप्रयोग जैसे दूरसंचार, टीवी प्रसारण, आकाशवाणी के लिए उपग्रह सँचार। 2. दूरसंवेदी द्वारा संसाधन सर्वेक्षण और प्रबंधन, पर्यावरण जाँच पड़ताल और मौसम विज्ञान सम्बंधी सेवाएँ। 3. उपर्युक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए देशी उपग्रहों तथा प्रक्षेपण यानों  का विकास।

इसरो (ISRO)- 1962 ई. में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की स्थापना की गई जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान राष्ट्रीय समिति का गठन किया गया। इसके साथ 1969 ई. में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान  संगठन और 1972 में अंतरिक्ष आयोग एवं अंतरिक्ष विभाग जोड़ा गया। अंतरिक्ष अनुसंधान गतिविधियों और अंतरिक्ष अनुप्रयोग कार्यक्रमों की योजना बनाने, निष्पादन और प्रबंधन के  लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) जिम्मेदार है।

अन्य सहयोगी संगठन

1. विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र- VSSC - यह तिरुवनंतपुरम् में स्थित प्रक्षेपण यान के विकास का मुख्य केंद्र है।

2. इसरो उपग्रह केंद्र - ISAC - यह बंगलौर में स्थित उपग्रहों के डिज़ाइन, निर्माण, परीक्षण एवं प्रबंधन करने के लिए जिम्मेदार है।

3. अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र - SAC- अहमदाबाद में स्थित यह अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के व्यावहारिक अनुप्रयोगों के लिए यंत्र बनाने, संगठित और निर्माण करने के लिए इसरो का अनुसंधान एवं विकास केंद्र है।

4. शार केंद्र - SHAR- आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में स्थित यह इसरो का मुख्य प्रक्षेपण केंद्र है।

5. तरल नोदन यंत्र - LPSC- यह प्रमोचक रॉकेट तथा उपग्रहों के लिए द्रव एवं क्रायोजेनिक नोदन के विकास में अग्रणी केंद्र है। इसकी सुविधाएँ तिरुवनंतपुरम, बँगलौर और महेंद्रगिरि (तमिलनाडु) में स्थित है।

6. विकास, शिक्षा संचार एकक (Development & Education Communication Unit - DECO)- अहमदाबाद में स्थित यह केंद्र अंतरिक्ष अनुप्रयोग कार्यक्रम की संकल्पना, परिभाषा, योजना और सामाजार्थिक मूल्यांकन में लगा हुआ है।

7. इसरो दूरमापी यंत्र, पथ और कमांड नेटवर्क - ISTRAC- इसका मुख्यालय और अंतरिक्षयान नियंत्रण केंद्र बंगलौर में एवं इसके भू-स्थल केंद्र का नेटवर्क श्रीहरिकोटा, तिरुवनंतपुरम, बँगलौर, लखनऊ, कार निकोबार और मॉरीशस में स्थित है।

8. प्रमुख नियंत्रण सुविधा (Master Control Facility)- हासन, कर्नाटक में स्थित यह स्थान इनसैट उपग्रहों के सभी उत्तर प्रक्षेपण परिचालनों के लिए जिम्मेदार है।

9. इसरो अक्रिय यंत्र एकक-IIRU - तिरुवनंतपुरम् में स्थित यह एकक उपग्रहों एवं प्रक्षेपण यानों दोनों के लिए अक्रिय यंत्रों का विकास करती है।

10. भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला- PRL - अहमदाबाद में स्थित यह प्रयोगशाला अंतरिक्ष विभाग के अधीन आती है।

11. राष्ट्रीय दूरसंवेदी एजेंसी-NRSA- हैदराबाद में स्थित यह केंद्र पृथ्वी संसाधनों की जाँच-पड़ताल करता है।

12. राष्ट्रीय मीसोस्फीयर, स्ट्रेटोस्फीयर, ट्रोपोस्फियर राडार सुविधा- NMRF- गंदकी, आंध्र प्रदेश में वातावरणिक अनुसंधान करने के लिए वैज्ञानिक इस सुविधा का इस्तेमाल करते हैं।

13. इसरो जड़त्वीय प्रणाली यूनिट- तिरुवनंतपुरम स्थित आई.आई.एस.यू जड़त्वीय संवेदकों तथा प्रणालियों एवं संबंधित उपग्रह तत्व में अनुसंधान एवं विकास कार्य आयोजित करती है।

14. विद्युत प्रकाशिकी प्रणाली प्रयोगशाला (लियोस)- बंगलुरू स्थित लियोस उपग्रहों और प्रमोचक राकेटों के लिए अपेक्षित विद्युत प्रकाशिकी संवेदकों और कैमरों के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास कार्य करती है।

इनसैट प्रणाली - 1980 के दशक में इनसैट प्रणाली से भारत के संचार क्षेत्र में बड़ी क्रांति का सूत्रपात हुआ। इसमें ग्यारह उपग्रह इन्सेट-4सीबी, इनसेट-4बी, इनसेट-4ए, एडुसेट, इनसेट-3ई, जीसेट-2, इनसेट-3ए, कल्पना-1, इनसेट-3सी, इनसेट-3बी और इनसेट-2ई वर्तमान में सेवा प्रदान कर रहे हैं। यह प्रणाली कुल मिलाकर 66 सी-बैंड ट्रांसपोंडर्स, 8 वृहद् सी-बैंड ट्रांसपोंडर्स और 3 के यू बैंड ट्रांसपोंडर्स उपलब्ध कराती है। बहुउद्देश्यीय उपग्रह प्रणाली होने के कारण यह दूरसंचार, टेलीविजन प्रसारण, मौसम पूर्वानुमान, आपदा चेतावनी और बचाव क्षेत्रों में सेवाएँ उपलब्ध कराता है।

भारतीय दूरसंवेदी उपग्रह प्रणाली- आज भारत के पास दूरसंवेदी उपग्रहों का सबसे बड़ा समूह उपलब्ध है जो कि राष्ट्रीय और विश्व, दोनों ही स्तरों पर सेवाएँ देते हैं। भारतीय दूरसंवेदी उपग्रहों (आई आर एस) के जरिए विभिन्न स्थानिक विभेदनों में डाटा उपलब्ध हैं जो कि 360 मी. से शुरू होता है और 5.8 मीटर के विभेदन तक जाता है। आई आर एस अंतरिक्षयानों पर लगे अत्याधुनिक कैमरे विभिन्न स्पैक्ट्रल बैंडों में पृथ्वी के चित्र खींचते हैं। इस समूह में अब 10 उपग्रह प्रचालित हैं- ओसेनसेट-2, रिसेट-2, कार्टोसेट-2ए, आईएमएस-1, कार्टोसेट-2, कार्टोसेट-1, रिसोर्ससेट-1, टीईएस, ओसेनसेट-1 व आईआरएस। इन उपग्रहों और आगामी वर्षों में योजित विषयवस्तु श्रृंखला के उपग्रहों जैसे कि मेघा-ट्रापिक्स, सरल एवं इन्सैट-3डी के साथ भारतीय भू-प्रेक्षण प्रणाली मानचित्रकला से लेकर जलवायु तक के कई क्षेत्रों में उपयोग हेतु प्रचलनात्मक उत्पाद व सेवा प्रदान करने की आशा है।
आईआरएस अंतरिक्षयान द्वारा भेजे गए चित्रों का भारत में अनेक प्रकार से उपयोग किया जाता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण कृषि में फसलों का क्षेत्रफल और उपज का अनुमान है। साथ ही इन चित्रों का उपयोग जल भंडारों को जानने में किया जाता है। वनों का सर्वेक्षण और प्रबंधन तथा बंजर भूमि पहचान इस प्रकार के अन्य उपयोग हैं।

प्रक्षेपण यान (Launch vehicle) - 1980 ई. में पहले स्वदेशी प्रक्षेपण यान एस एल वी-3 के सफल परीक्षण के पश्चात् इसरो ने अगली पीढ़ी के संवद्र्धित उपग्रह प्रक्षेपण यान (ए एस एल वी) का निर्माण किया। अक्टूबर 1994 में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान द्वारा आई आर एस-पी 2 यान को छोड़े जाने के साथ हमारे प्रक्षेपण यान कार्यक्रम ने बड़ी छलांग लगाई। 18 अप्रैल, 2001 को भारत ने सफलतापूर्वक स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान छोड़ा। भारत के पास ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पी एस एल वी) व भू-स्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (जी एस एल वी) की क्षमतायें उपलब्ध हैं। चार चरणों वाला पी एस एल वी 1600 किग्रा तक के उपग्रहों को 800 किग्रा. ध्रुवीय कक्षा में छोड़ सकता है। यह एक टन के पेलोड को भू-स्थिरीय हस्तांतरण कक्षा से भी प्रक्षेपित कर सकता है। जी एस एल वी 2,500 किग्रा श्रेणी के उपग्रहों को भूस्थिर हस्तांतरण कक्षा में छोड़ सकता है।

वर्ष 2009-10 में प्रगति - देश की रक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इसरो ने रडार इमेजिंग उपग्रह रीसेट-2 का प्रक्षेपण किया है। इसी तरह से इसरो ने महासागरीय अनुसंधान के लिए अत्याधुनिक उपग्रह ओसेनसेट-2 का पीएसएलबी-सी-14 के द्वारा सफल प्रक्षेपण किया है।

भारत की प्रमुख पर्वत श्रृखलाएं और नदीयाँ

पर्वत शिखर

समुद्र तल से ऊंचाई (मीटर में)

नदी लम्बाई (कि.मी.)
के 2 8,611 ब्रह्मपुत्र
2900
कंचन जंघा 8,598 सिन्धु 2880
नंगा पर्वत 8,128
गोदावरी 2465
गाशेर ब्रम
8,068 गंगा 2071
ब्रॉड पीक 8,047 सतलज 1500
दिस्तेगिल सर 7,885 यमुना 1375
माशेर ब्रम (पूर्वी) 7,821 घाघरा 1080
नंदा देवी 7,817
चम्बल 965
माशेर ब्रम (पश्चिम) 7,806 महानदी 828
राकापोशी 7,788 कावेरी 805
कामेत 7,756 सोन
780
सासेर काँगड़ी 7,672 कोसी 730
सिक्याँग काँगड़ी 7,544 ताप्ती
724
सिया काँगड़ी 7,422 रावी 720
चौखम्बा (बद्रीनाथ शिखर) 7,138
तुंगभद्रा
640
त्रिशूल (पश्चिम)
7,138 व्यास 625
नूनकून 7,135 रामगंगा 602
पौहुनरी 7,128 पेन्नार अथवा पिनकिन 570
काँटो
7,090
माही
560
दूनागिरी
7,066    

प्राकृतिक संरचना

भारत का क्षेत्रफल

भारत ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के 63 वर्षों में बहुआयामी सामाजिक-आर्थिक प्रगति की है। भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग कि.मी. है, जो हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों से लेकर दक्षिण के उष्णकटिबंधीय सघन वनों तक फैला हुआ है। विश्व के  इस सातवें विशालतम देश को पर्वत तथा समुद्र शेष एशिया से अलग करते हैं, जिससे इसका अलग भौगोलिक अस्तित्व है। इसके उत्तर में  हिमालय पर्वत शृंखला है, जहाँ से यह दक्षिण में बढ़ता हुआ कर्क रेखा तक जाकर, पूर्व में बंगाल की खाड़ी और पश्चिम में अरब सागर के बीच हिन्द महासागर से जा मिलता है।

इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक 3,214 किलोमीटर और पूर्व से पश्चिम तक 2,933 किलोमीटर है। इसकी भूमि सीमा लगभग 15,200 कि.मी. है। मुख्य भूमि, लक्षद्वीप समूह और अण्डमान-निकोबार  द्वीप समूह के समुद्री तट की कुल लम्बाई 7516.6 कि.मी. है। 

सीमावर्ती देश

भारत के सीमावर्ती देशों में उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान और अफगानिस्तान हैं। उत्तर में चीन, नेपाल और भूटान हैं। पूर्व में म्यांमार और पश्चिम बंगाल के पूर्व में बांग्लादेश स्थित है। मन्नार की खाड़ी और पाक जलडमरू मध्य, भारत को श्रीलंका से अलग करते हैं।

हिमालय

हिमालय की तीन शंखलाएं हैं जो लगभग समानान्तर फैली हुई हैं। संसार की सबसे ऊँची चोटियों में से कुछ इन्हीं पर्वत शंखलाओं में हैं। पर्वतीय दीवार लगभग 2,400 किलोमीटर की दूरी तक फैली है, जो 240 किलोमीटर से 320 किलोमीटर तक चौड़ी है। पूर्व में भारत और म्याँमार  तथा भारत और बांग्लादेश के बीच पहाड़ी शंखलाओं की ऊंचाई बहुत कम है।

मैदानी क्षेत्र

सिन्धु और गंगा के मैदान लगभग 2400 किमी. लम्बे और 240 किमी. तक चौड़े हैं। ये तीन अलग-अलग नदी प्रणालियों सिन्धु, गंगा और ब्रह्मïपुत्र के थालों से बने हैं। ये संसार के विशालतम सपाट कछारी विस्तारों और पृथ्वी पर बसे सर्वाधिक घने क्षेत्रों में से एक हैं। 

रेगिस्तानी क्षेत्र

रेगिस्तानी क्षेत्र को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है- विशाल रेगिस्तान और लघु रेगिस्तान। विशाल रेगिस्तान कच्छ के  रण के पास से उत्तर की ओर लूनी नदी तक फैला हुआ है। राजस्थान-सिन्ध की पूरी सीमा रेखा इसी रेगिस्तान में है। लघु रेगिस्तान जैसलमेर और जोधपुर के बीच में लूनी नदी से शुरू होकर उत्तरी बंजर तक फैला हुआ है। 

दक्षिणी प्रायद्वीप

दक्षिणी प्रायद्वीप का पठार 460 से 1,220 मीटर तक की ऊंचाई के पर्वत तथा पहाडिय़ों की श्रेणियों द्वारा सिन्धु और गंगा के मैदानों से पृथक हो जाता है। इसमें प्रमुख हैं- अरावली, विंध्य, सतपुड़ा, मैकला और अजंता। प्रायद्वीप के एक तरफ पूर्वी घाट है, दूसरी तरफ पश्चिमी घाट हैं।

नदियाँ

भारत की नदियाँ इस प्रकार वर्गीकृत की जा सकती हैं - (1) हिमालय की नदियाँ, (2) प्रायद्वीपीय नदियाँ, (3) तटीय नदियाँ, तथा (4) अंत:स्थलीय प्रवाह क्षेत्र की नदियाँ।
हिमालय की नदियाँ बारहमासी हैं जिनको पानी आमतौर से बर्फ पिघलने से मिलता है। उनमें वर्ष भर निर्बाध प्रवाह रहता है। प्रायद्वीप की नदियों में सामान्यत: वर्षा का पानी रहता है, इसलिए पानी की मात्रा घटती-बढ़ती रहती है। अधिकाँश नदियाँ बारहमासी नहीं हैं। पश्चिमी राजस्थान में नदियाँ बहुत कम हैं। उनमें से अधिकतर थोड़े दिन ही बहती हैं। इस भाग की केवल लूनी नदी ही ऐसी नदी है, जो कच्छ के रण में गिरती है।

जलवायु

भारत की जलवायु मोटे रूप से उष्ण-कटिबंधीय है। यहाँ चार ऋतुएं होती हैं- शीत ऋतु (जनवरी-फरवरी), ग्रीष्म ऋतु (मार्च-मई), वर्षा ऋतु या दक्षिण-पश्चिम मानसून का समय (जून-सितम्बर) और मानसून-पश्चात ऋतु (अक्तूबर-दिसंबर) जिसे दक्षिण प्रायद्वीप में उत्तर-पूर्व मानसून का मौसम भी कहा जाता है। भारत की जलवायु पर दो प्रकार की मौसमी हवाओं का प्रभाव पड़ता है- उत्तर-पूर्वी मानसून और दक्षिण पश्चिमी मानसून। उत्तर-पूर्वी मानसून को आमतौर पर शीत-मानसून कहा जाता है। 

पेड़-पौधे

भारत को आठ वनस्पति क्षेत्रों में बाँटा जा सकता है, पश्चिमी हिमालय, पूर्वी हिमालय, असम, सिन्धु का मैदान, गंगा का मैदान, दक्कन, मालाबार और अंडमान।
पश्चिमी हिमालय क्षेत्र कश्मीर से कुमाऊं तक फैला है। इस क्षेत्र के शीतोष्ण कटिबंधीय भाग में चीड़, देवदार, कोनधारी वृक्षों (कोनीफर्स) और चौड़ी पत्ती वाले शीतोष्ण वृक्षों के वनों का बाहुल्य है। इससे ऊपर के क्षेत्रों में देवदार, नीली चीड़, सनोवर वृक्ष और श्वेत देवदार के जंगल हैं। अलपाइन क्षेत्र शीतोष्ण क्षेत्र की ऊपरी सीमा से 4,750 मीटर या इससे अधिक ऊँचाई तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र मेंं ऊंचे स्थानों में मिलने वाले श्वेत देवदार,श्वेत भोजवृक्ष और सदाबहार वृक्ष पाए जाते हैं। पूर्वी हिमालय क्षेत्र सिक्किम से पूर्व की ओर शुरू होता है और इसके  अंतर्गत दार्जिलिंग, कुर्सियांग और उसके साथ लगे भाग आते हैं। इस शीतोष्ण क्षेत्र में ओक, जायफल, द्विफल, बड़े फूलों वाला सदाबहार वृक्ष और छोटी बेंत के जंगल पाए जाते हैं। असम क्षेत्र में ब्रह्मïपुत्र और सुरमा घाटियाँ और बीच की पर्वत श्रेणियाँ आती हैं। इनमें सदाबहार जंगल हैं और बीच-बीच  में घने बाँसों और लम्बी घासों के झुरमुट हैं। सिंधु मैदान क्षेत्र में पंजाब, पश्चिमी राजस्थान और उत्तरी गुजरात के मैदान शामिल हैं। यह क्षेत्र शुष्क और गर्म है और इनमें प्राकृतिक वनस्पतियाँ मिलती हैं। गंगा मैदान क्षेत्र के अंतर्गत अरावली श्रेणियों से लेकर बंगाल और उड़ीसा तक का क्षेत्र आता है। इस क्षेत्र का अधिकतर भाग कछारी मैदान है और इनमें गेहूं, चावल और गन्ने की खेती होती है। केवल थोड़े से भाग में विभिन्न प्रकार के जंगल हैं। दक्कन क्षेत्र में भारतीय प्रायद्वीप की सारी पठारी भूमि शामिल है, जिसमें पतझड़ वाले वृक्षों के जंगलों से लेकर तरह-तरह की जंगली झाडिय़ों के वन हैं। मालाबार क्षेत्र के अधीन प्रायद्वीप तट के साथ-साथ लगने वाली पहाड़ी तथा अधिक नमी वाली पट्टïी है। इस क्षेत्र में घने जंगल हैं। इनके अलावा इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण वाणिज्यिक फसलें जैसे नारियल, सुपारी, काली मिर्च, कॉफी, चाय, रबड़ और काजू की खेती होती है। कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक के हिमालय क्षेत्र (नेपाल, सिक्किम, भूटान, नगालैंड) और दक्षिण प्रायद्वीप में क्षेत्रीय पर्वतीय श्रेणियों में ऐसे देशी पेड़-पौधों की अधिकता है जो दुनिया में अन्यत्र कहीं नहीं मिलते हैं।

जीव-जन्तु

जलवायु और प्राकृतिक वातावरण की व्यापक भिन्नता के कारण भारत में लगभग 89,451 किस्म के जीव-जंतु पाए जाते हैं। इनमें 2,577 प्रोटिस्टा (आद्यजीव), 68,389 एंथ्रोपोडा, 119 प्रोटोकॉर्डेटा, 2,546 किस्म की मछलियाँ, 209 किस्म के उभयचारी, 456 किस्म के सरीसृप, 1,232 किस्म के पक्षी और 390 किस्म के स्तनपायी जीव, पाँच हजार से कुछ अधिक मोलस्क प्राणी और 8,329 अन्य अकशेरूकी आदि शामिल हैं।

सर्व शिक्षा अभियान

सर्व शिक्षा अभियान (एसएसए) की योजना प्रारंभिक शिक्षा के सर्वसुलभीकरण के निमित्त मिशन पद्धति अपनाए जाने के संबंध में अक्टूबर 1998 में आयोजित राज्य शिक्षा मंत्रियों के सम्मेलन की सिफारिशों का परिणाम है। सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत सहायता नौवीं योजना के दौरान केंद्र और राज्य सरकार के बीच 85:15 की भागीदारी के आधार पर थी, दसवीं योजना के दौरान 75:25 और इसके बाद 50:50 के आधार पर थी।

कार्यक्रम में समूचे देश को शामिल किया गया है और 12.3 लाख बस्तियों में 19.4 करोड़ बच्चों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखा गया है। इस योजना के आधीन लगभग 8.5 लाख मौजूदा प्राथमिक और अपर प्राथमिक स्कूल तथा 33 लाख मौजूदा अध्यापक शामिल हैं। वर्ष 2004-05 के  दौरान इस कार्यक्रम के  अंतर्गत 598 जिलों की वार्षिक कार्य योजनाओं को स्वीकृति किया गया। इस कार्यक्रम में ऐसी बस्तियों में नए स्कूल स्थापित करना, जहाँ कोई स्कूली सुविधाएँ मौजूद नहीं हैं तथा अतिरिक्त क्लासरूमों, पेयजल, अनुरक्षण अनुदान तथा सामाजिक सुधार अनुदान के प्रावधान के माध्यम से स्कूल के मौजूदा आधारिक तंत्र को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया जाएगा। एसएसए में लड़कियों और कमजोर वर्गों के बच्चों पर विशेष ध्यान दिया गया है। दसवीं योजना के दौरान एसएसए के लिए 17,000 करोड़ रु. का आवंटन किया गया।   एसएसए की वजह से विद्यालय न जाने वाले बच्चों की संख्या वर्ष 2001 में 3.5 करोड़ से घटकर वर्ष 2003-04 में 2.3 करोड़ हो गई।

जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम

1986 की नई शिक्षा नीति और 1992 में उसमें किए गए संशोधन तथा इसकी कार्य योजना के अनुरूप सबको प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम की एक नई पहल की गयी। इसमें सबको शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए कार्य योजना में गयी रणनीति को विकेंद्रित रूप में लागू करने की बात कही गयी है। जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम केन्द्र द्वारा  प्रायोजित कार्यक्रम है। जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम एक ऐसी परियोजना है जिसमें 85 प्रतिशत धन केंद्र सरकार और 15 प्रतिशत धन सम्बन्धित राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है।
डीपीईपी अपने सर्वाधिक प्रचालन में 18 राज्यों में 273 जिलों में सक्रिय था। परंतु कार्यक्रम के विभिन्न चरणों के उत्तरोत्तर बंद किये जाने से अब यह केवल दो राज्यों- राजस्थान व उड़ीसा के 17 जिलों में सक्रिय है।

वर्तमान काल में स्कूलों की सुविधा हर जगह उपलब्ध है। देश की 94 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या को एक किमी. की दूरी के अंदर ही प्राथमिक शिक्षा की सुविधा उपलब्ध है। जहां तक उच्च प्राइमरी शिक्षा का प्रश्न है, यह दूरी 3 किमी है। प्राइमरी स्तर पर संपूर्ण देश एवं अधिकांश राज्यों में सकल नामांकन अनुपात 100 प्रतिशत से अधिक है। किंतु कुछ ऐसे भी राज्य हैं जहाँ यह अनुपात काफी कम है। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, जम्मू व कश्मीर और मेघालय शामिल हैं। इन राज्यों के अतिरिक्त, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और सिक्किम ऐसे राज्य हैं जहाँ उच्च प्राइमरी स्तर पर सकल नामांकन अनुपात राष्टï्रीय औसत से कम है। इन राज्यों में अधिकांशत: साक्षरता दर राष्टरीय औसत से कम है।

प्राथमिक शिक्षा का सर्वव्यापीकरण प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम का अंतिम उद्देश्य है, किंतु यह कार्यक्रम लैंगिक एवं क्षेत्रीय असमानताओं को ध्यान में रखे बिना सफल नहीं हो सकता है। प्राइमरी स्तर पर लड़कियों का नामांकन 1950-51 के 54 लाख से बढ़कर 1998-99 में 4.82 करोड़ हो चुका था। उच्च प्राइमरी स्तर पर यह संख्या 1950-51 के 5 लाख से बढ़कर 1.63 करोड़ तक पहुँच चुकी है। वर्तमान काल में लड़कियों के नामांकन की दर लड़कों से अधिक है। किन्तु असमानताएं आज भी स्पष्टï दृष्टिïगोचर है। प्राइमरी स्तर पर लड़कियों के नामांकन का प्रतिशत 43.5 और उच्च प्राइमरी स्तर पर 40.5 है। लड़कियों द्वारा बीच में शिक्षा छोडऩे की दर भी लड़कों से अधिक है।

कर संरचना

कर संरचना

भारत की कर संरचना प्रणाली काफी विकसित है। भारतीय संविधान के प्रावधानों के अनुरुप करों व ड्यूटीज को लगाने का अधिकार सरकार के तीनों स्तरों को प्रदान किया गया है। केद्र सरकार जिन करों व ड्यूटीज को लगा सकती है, वे हैं- आयकर ( कृषीय आय पर कर के अतिरिक्त जिसे राज्य सरकार ही लगा सकती है), कस्टम ड्यूटी, सेंट्रल एक्साइज और बिक्रीकर और सेवाकर। राज्य सरकारों द्वारा लगाये जाने वाले प्रमुख कर हैं- बिक्रीकर (वस्तुओं के राज्यों के भीतर बिकने पर लगाया जाने वाला कर), स्टैम्प ड्यूटी (सम्पत्ति के हस्तांतरण पर लगाया जाने वाला कर), स्टेट एक्साइज (शराब के निर्माण पर लगाई जाने वाली ड्यूटी), कर राजस्व (कृषीय व गैर-कृषीय उद्देश्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली भूमि पर लगाया जाने वाला कर) व मनोरंजन व प्रोफेशनल्स पर लगाया जाने वाला कर। स्थानीय निकाय सम्पत्तियों पर कर लगाने का अधिकार रखती है (इमारतों इत्यादि पर), चुंगी (स्थानीय निकाय के अधिकार क्षेत्र पर प्रवेश करने वाली वस्तुओं या उपभोग पर लगाया जाने वाला कर), बाजारों पर व जल सप्लाई, सीवर इत्यादि पर लगाया जाने वाला कर।
1991 में देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत के बाद से कर संरचना में भारी परिवर्तन आया है। करों की संख्या पहले से काफी ज्यादा बढ़ चुकी है। किये गये परिवर्तनों में शामिल हैं- कर संरचना को तार्किक बनाना, कस्टम ड्यूटी, कार्पोरेट टैक्स, कस्टम ड्यूटी में कमी करना जिससे कि वे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों यानि आसियान के समतुल्य हो जाएं, देश में वैट को लागू करना इत्यादि।

मूल्य वद्र्धित कर (वैट)

राज्य स्तर पर वैट की शुरुआत करके देश में कर सुधारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। वैट राज्यों की पहली बिक्री कर प्रणाली के स्थान पर लाया गया है। वैट एक ऐसा कर है जो जिसे वस्तुओं व सेवाओं के अंतिम उपभोग पर लगाया जाता है और अंतोगत्वा इसका भार उपभोक्ता पर पड़ता है।
वैट मुख्य रूप से राज्य का विषय है जिसे राज्यों की सूची से उठाया गया है। वर्तमान में वैट की दो मुख्य दरें हैं- 4 प्रतिशत व 12.5 प्रतिशत। इसके अतिरिक्त कुछ चीजों पर छूट भी दी गई है और कुछ चुनी हुई चीजों पर 1 प्रतिशत का ही कर लगाया जाता है।

प्रत्यक्ष कर संहिता (Direct Tax Code)

प्रत्यक्ष कर संहिता को लागू करके केंद्र सरकार देश में एक समेकित  कर सरंचना का ढांचा तैयार करना चाहती है जिसके द्वारा आयकर, डेविडेन्ड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स, फ्रिंज बेनेफिट टैक्स और वेल्थ टैक्स जैसे सभी प्रत्यक्ष करों में संशोधन करके एक ऐसे प्रभावी, समतुल्य और कार्यकुशल प्रत्यक्ष कर प्रणाली की स्थापना करना चाहती है जिसका लोग स्वत: पालन करें और कर-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात में अपने-आप वृद्धि हो जाए। इसे लागू करने का एक अन्य उद्देश्य वाद-विवाद को कम करना और मुकदमों को कम करना है।
यह कर प्रणाली पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय कर प्रणाली के अनुरुप होगी। इसके द्वारा अन्तोगत्वा सिंगल यूनीफाइड टैक्सपेयर रिपोर्टिंग सिस्टम की स्थापना हो सकेगी। प्रत्यक्ष कर संहिता के द्वारा सभी प्रत्यक्ष कर एकल संहिता के अंतर्गत आ सकेंगे।

बीमा

बीमा क्षेत्र में सुधार

बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आई आर डी ए) अधिनियम, 1999 के अधिनियम द्वारा बीमा क्षेत्र खोलकर और बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण का गठन करके    बीमा सुधार की स्थापना की गई है। 

जब से बीमा उद्योग का उदारीकरण किया गया है जीवन, गैर जीवन और पुनर्बीमा क्षेत्र प्रत्येक में भागीदारों की संख्या 44 बीमाकर्ता हो गई है। जबकि उदारीकरण के पहले कुल भागीदारों की संख्या मात्र 6 ही थी। उद्योग द्वारा बीमाकृत प्रीमियम राशि वर्ष 2000-01 में 34,898.47 करोड़ रु. से बढ़कर वर्ष 2008-09 में 223555.79 करोड़ रु. हो गई।

जीवन बीमा

41 अरब अमेरिकी डॉलर के पूंजीकरण वाला भारतीय बीमा उद्योग का विश्व में पांचवां स्थान है और यह 32-34 प्रतिशत की वार्षिक रफ्तार से वृद्धि कर रहा है। आईआरडीए के अनुसार 2009-10 के दौरान विभिन्न बीमा कंपनियों ने 10.55 मिलियन पॉलिसियां बेचीं जिसमें एलआईसी का शेयर 8.52 मिलियन व प्राइवेट बीमा कंपनियों का शेयर 2.03 मिलियन पॉलिसियों का रहा। आईआरडीए के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2009-10 के दौरान प्रीमियम के रूप में बीमा कंपनियों को कुल 24.64 अरब अमेरिकी डॉलर की राशि मिली।

भारतीय जीवन निगम (एल आई सी)

जीवन बीमा निगम को तत्कालीन जीवन बीमाकर्ताओं की परिसम्पत्तियों और दायित्वों को अपने अधीन करके अपने देश में जीवन बीमा का कारोबार करने हेतु पहली सितम्बर, 1956 में स्थापित किया गया था। 31 मार्च, 2008 को जीवन बीमा निगम के 8 अंचल कार्यालय, 106 मण्डल और 2048 शाखा कार्यालय थे। मार्च 2010 के अंत में एलआईसी की मार्केट में भागीदारी कुल 65 प्रतिशत थी।

साधारण बीमा

आईआरडीए द्वारा जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार साधारण बीमा उद्योग ने वर्ष 2009-10 के दौरान प्रीमियम के रूप में 13.42 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की। उद्योग ने इस अवधि के दौरान कुल 7.84 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रीमियम प्राप्त किया। इस सेगमेंट में सरकारी कंपनियों का प्रदर्शन प्राइवेट कंपनियों की अपेक्षा काफी अच्छा रहा।

भारतीय साधारण बीमा निगम (जी आई सी)

साधारण बीमा निगम को 3 नवम्बर, 2000 को ''भारतीय पुनर्बीमाकर्ताÓÓ के रूप में अनुमोदित किया गया। भारतीय पुनर्बीमाकर्ता के रूप में जी आई सी सरकारी क्षेत्र के  चार और अन्य निजी साधारण बीमा कंपनियों को पुनर्बीमा को सहायता प्रदान करती है। निगम ने पूर्णरूपेण जीवन पुनर्बीमा का कार्य 1 अप्रैल 2003 से प्रारंभ किया।

सरकारी क्षेत्र की साधारण बीमा कंपनियाँ

जी आई सी से अलग होने के बाद चार साधारण कम्पनियाँ, नामत: नेशनल इंश्योरेंस कं. लि., न्यू इंडिया इंश्योरेंस कं. लि., दि ओरिएण्टल इंश्योरेंस कं. लि. और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कं. ने एक संघ बनाया जो भारतीय साधारण पुनर्बीमाकर्ता संघ जी आई पी एस के नाम से जाना जाता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली है। चारों कंपनियों के 100 क्षेत्रीय कार्यालयों, 1383 मंडल कार्यालयों, भारत में 2842 शाखा कार्यालयों और विदेशों में स्थित 42 कार्यालयों का नेटवर्क है।

मेडिकल बीमा

भारत में हाल के दिनों में मेडिकल बीमा का क्षेत्र सरकारी व गैर-सरकारी दोनों ही कंपनियों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो रहा है। पिछले दो वित्तीय वर्र्षों 2008-09 और 2009-10 के दौरान भारतीय मेडिकल बीमा उद्योग का प्रदर्शन काफी शानदार रहा है। ऐसी आशा की जा रही है कि 2009-10 से 2013-14 के मध्य इस सेगमेंट में वृद्धि दर 25 प्रतिशत तक हो सकती है।

माइक्रो बीमा

माइक्रो बीमा अचानक आने वाले खतरों के लिए किया जाता है। अभी तक व्यक्तिगत व समूह सेगमेंट्स में नौ बीमा कंपनियों ने 26 माइक्रो बीमा उत्पादों को बाजार में उतारा है।

बैंकाश्योरेंस

भारतीय जीवन बीमा की तुलना में प्राइवेट कंपनियां इस सेगमेंट में ज्यादा रुचि ले रही हैं। बैंकाश्योरेंस से तात्पर्य ऐसे बीमा से है जिसका वितरण बैंकों के द्वारा किया जाता है।

जीवन बीमा के क्षेत्र की कंपनियां

सरकारी कंपनी
1. भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी)

प्राइवेट कंपनियां
1. बजाज एलायंज लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
2. बिड़ला सन-लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
3. एचडीएफसी स्टैंडर्ड लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
4. आईसीआईसीआई प्रुडेंशियल लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
5. आईएनजी वैश्य लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
6. मैक्स न्यूयॉर्क लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
7. मेटलाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
8. कोटक महिंद्रा ओल्ड म्युचुअल लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
9. एसबीआई लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
10. टाटा एआईजी लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
11. रिलायंस लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
12. अवीवा लाइफ इंश्योरेंस कंपनी प्राइवेट लि.
13. सहारा इंडिया लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
14. श्रीराम लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.
15. भारती एक्सा लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लि.

साधारण बीमा के क्षेत्र की कंपनियां
सरकारी कंपनियां
1. न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लि.
2. नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लि.
3. द ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी लि.
4. यूनाईटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लि.
5. एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कार्पोरेशन
6. एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लि.

प्राइवेट कंपनियां
1. बजाज एलायंज जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि.
2. आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि.
3. इफ्को-तोकियो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि.
4. रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि.
5. रॉयल सुंदरम एलायंस इंश्योरेंस कंपनी लि.
6. टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि.
7. चोलामंडलम जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि.
8. एचडीएफसी चब्ब जनरल इंश्योरेंस कंपनी लि.
9. स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी लि.

पुनर्बीमा
1. जनरल इंश्योरेंस कार्पोरेशन ऑफ इंडिया

भारत में बैंकिंग

भारत में बैंकिंग का इतिहास काफी प्राचीन है। भारतीयों द्वारा स्थापित प्रथम बैंकिंग कंपनी अवध कॉमर्शियल बैंक (1881) थी। 1940 के दशक में 588 बैंकों की असफलता के कारण कड़े नियमों की जरूरत महसूस की गई। फलस्वरूप बैंकिंग कंपनी अधिनियम फरवरी 1949 में पारित हुआ, जो बाद में बैंकिंग नियमन अधिनियम के नाम से संशोधित हुआ।

19 जुलाई, 1969 को 14 प्रमुख बैंकों (जिनमें जमा राशि 50 करोड़ रु. से अधिक थी) का राष्ट्रीयकरण किया गया। बाद में अप्रैल 1980 में 6 और बैंकों का भी राष्टरीयकरण किया गया। राष्टरीयकरण के बाद के तीन दशकों में देश में बैंकिंग प्रणाली का असाधारण गति से विस्तार हुआ- भौगोलिक लिहाज से भी और वित्तीय विस्तार की दृष्टिï से भी। 14 अगस्त, 1991 को एक उच्च-स्तरीय समिति वित्तीय प्रणाली के ढांचे, संगठन, कामकाज और प्रक्रियाओं के सभी पहलुओं की जाँच करने के लिए नियुक्त की गई। एम. नरसिंहम की अध्यक्षता में बनी इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 1992-93 में बैंकिंग प्रणाली में व्यापक सुधार किए गए। 

हाल में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा किये गये एक स्ट्रेस टेस्ट के अनुसार भारतीय बैंकिंग प्रणाली किसी भी तरह के आर्थिक संकट और ऊँची नॉन-परफॉर्र्मिंग परिसंपत्तियों के झटकों को सहन करने में पूरी तरह से सक्षम है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि अब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास सोने का दुनिया में 10वां सबसे बड़ा भंडार है। नवंबर 2009 में रिजर्व बैंक ने 6.7 अरब अमेरिकी डॉलर की लागत से अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से 200 मीट्रिक टन सोने की खरीद की थी। इस खरीद से उसके विदेशी मुद्रा कोष में गोल्ड होल्डिंग्स की हिस्सेदारी बढ़ गई है। पहले गोल्ड होल्डिंग्स की हिस्सेदारी इसमें 4 प्रतिशत थी जो अब बढ़कर 6 प्रतिशत हो गई है।

यूनाईटेड किंगडम स्थित ब्रांड फाइनेंस द्वारा किये गये वार्षिक अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग अध्ययन के अनुसार 20 भारतीय बैंकों को ब्रांड फाइनेंस ग्लोबल बैंकिंग 500 की सूची में शामिल किया गया है। वस्तुत: स्टेट बैंक ऑफ इंडिया भारत की ऐसी पहली बैंक बन गई है जिसे दुनिया की पचास बैंकों की सूची में स्थान मिला है। इसे पचास बैंकों के मध्य 36वां स्थान मिला है। 2009 में जहां स्टेट बैंक की ब्रांड वैल्यू 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर थी वहीं यह 2010 में 4.6 अरब डॉलर हो गई है। आईसीआईसीआई बैंक को दुनिया की 100 श्रेष्ठ बैंकों की सूची में स्थान मिला है। इसकी ब्रांड वैल्यू 1.3 अरब अमेरिकी डॉलर है।

बैंकों का वित्तीय प्रदर्शन
भारत की अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की 2008-09 की बैलेंस शीट यह दर्शाती हैं कि इनकी वित्तीय स्थित काफी संतोषजनक है। लेकिन  ये बैंकें भी ग्लोबल आर्थिक संकट से पूरी तरह से अछूती नहीं रही थीं।

मार्च 2009 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की कांसॉलीडेटेट बैलेंस शीट यह दर्शाती हैं कि इनकी वृद्धि दर 21.2 प्रतिशत रही। जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में वृद्धि दर 25.0 प्रतिशत रही थी। सार्वजनिक क्षेत्रों की बैंकों में जहां वृद्धि दर सकारात्मक रही वहीं निजी व विदेशी बैंकों ने नकारात्मक वृद्धि दर दर्ज की। ग्लोबल आर्थिक संकट के दौरान अधिकांश लोगों ने अपने पैसे को सार्वजनिक क्षेत्रों की बैंकों में जमा करना मुनासिब समझा। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की डिपॉजिट और क्रेडिट के विषय में रिजर्व बैंक की तिमाही आंकड़ों के संबंध में जारी रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल आर्थिक संकट के दौरान राष्ट्रीयकृत बैंकों, विदेशी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के डिपॉजिट क्रमश: 17.8 प्रतिशत, 5.6 प्रतिशत और 3.0 प्रतिशत रहे।

जहां तक सकल बैंक क्रेडिट का सवाल है, राष्ट्रीयकृत बैंकों ने देश में बैंकों द्वारा बांटे गये ऋण का 50.5 प्रतिशत बांटा। इसमें भी स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने 23.7 प्रतिशत ऋण बांटा। विदेशी बैंकों व क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों ने क्रमश: 5.5 प्रतिशत और 2.5 प्रतिशत ऋण ही बांटे।

रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की देश में कुल 34,709 शाखाएं हैं।

पूंजी पर्याप्तता अनुपात (Capital Adequate Ratio)

 भारतीय बैंकिंग प्रणाली ने ग्लोबल आर्थिक संकट का डटकर मुकाबला किया है। यह उसके सुधरे हुए पूंजी पर्याप्तता अनुपात से जाहिर होता है। मार्च 2009 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के पूंजी पर्याप्तता अनुपात में 13.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जबकि भारतीय रिजर्व बैंक के आदेशों के अनुसार इसे कम-से-कम 9.0 प्रतिशत होना अनिवार्य है।

भारत में अनुसूचित बैंकों की सूची

  •   इलाहाबाद बैंक- देश की सबसे पुरानी सार्वजनिक क्षेत्र की बैंक
  •   आंध्र बैंक
  •   बैंक ऑफ बड़ौदा
  •   बैंक ऑफ इंडिया
  •   बैंक ऑफ मदुरा
  •   बैंक ऑफ महाराष्ट्र
  •   बैंक ऑफ पंजाब
  •   बैंक्यू नेशनाले डि पेरिस-इंडिया- अग्रणी ग्लोबल बैंक जो कार्पोरेट व विदेशी संस्थागत निवेशकों को सेवा प्रदान करती है
  •   केनरा बैंक
  •   सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया- यह एक वाणिज्यिक बैंक है जो क्रेडिट, डिपॉजिट और इंटरनेशनल बैंकिंग सुविधा उपलब्ध कराती है
  •   सेंचुरियन बैंक लिमिटेड
  •   सेंचुरियन बैंक
  •   सिफर सिक्योरिटीज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड- यह एक इन्वेस्टमेंट बैंक है जो प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपीटल के द्वारा फंड इकठ्ठा करती है
  •   सिटी बैंक- यह एक ग्लोबल कन्ज्यूमर बैंक है
  •   कार्पोरेशन बैंक
  •   कॉस्मोस बैंक- मल्टीस्टेट सिड्यूल्ड कोऑपरेटिव की सेवाएं प्रदान करती है
  •   देना बैंक
  •   डेवलपमेंट क्रेडिट बैंक
  •   एक्जिम बैंक अथवा एक्पोर्ट-इम्पोर्ट बैंक ऑफ इंडिया
  •   फेडरेल बैंक लिमिटेड
  •   गार्जियन सहकार बैंक नियामिता- समाज के कमजोर वर्र्गों को वित्तीय सेवा व लोन प्रदान करने वाली कोऑपरेटिव बैंक
  •   ग्लोबल ट्रस्ट बैंक- प्राइवेट बैंकिंग फर्म
  •   एचडीएफसी बैंक लिमिटेड- अनुसूचित वाणिज्यिक बैंक जो नेट बैंकिंग और कंज्यूमर लोन के क्षेत्र में विशेष रूप से सक्रिय है
  •   हरियाणा स्टेट कोऑपरेटिव एपेक्स बैंक लिमिटेड
  •   आईसीआईसीआई बैंक (द इंडस्ट्रियल क्रेडिट एंड इन्वेस्टमेंट कार्पोरेशन लिमिटेड ऑफ इंडिया
  •   आईडीबीआई बैंक- आईडीबीआई और सिडबी द्वारा प्रोमोट की जाने वाली प्राइवेट सेक्टर बैंक
  •   इंडियन बैंक
  •   इंडियन ओवरसीज बैंक
  •   इंडसइंड बैंक लिमिटेड- प्रमुख प्राइवेट सेक्टर बैंकिंग कंपनी
  •   इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया- औ ोगिक और वित्तीय वृद्धि को प्रोमोट करने वाली बैंक
  •   इंडस्ट्रियल इन्वेस्टमेंट बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड (आईआईबीआई)
  •   जम्मू-कश्मीर बैंक
  •   जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड- निजी क्षेत्र की बैंक
  •   कल्याण बैंक
  •   कपोल कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड
  •   लक्ष्मी विलास बैंक
  •   मांडवी कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड- कोऑपरेटिव सेक्टर का बैंकिंग संगठन
  •   नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलरमेंट- कृषि क्षेत्र को ऋण उपलब्ध कराने वाली बैंक
  •   नेशनल हाउसिंग बैंक- गृह वित्त संस्थानों को प्रोमोट करने वाली बैंक
  •   ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स- मर्र्चेंट बैंकिंग, अनिवासी भारतीयों को सेवा देने वाली और रूरल बैंकिंग के क्षेत्र में सक्रिय राष्ट्रीयकृत बैंक
  •   पंजाब नेशनल बैंक
  •   पंजाब एंड महाराष्ट्र कोऑपरेटिव बैंक प्राइवेट लिमिटेड
  •   पंजाब एंड सिंध बैंक
  •   रत्नाकर बैंक लिमिटेड- नेट बैंकिंग और लॉकर सुविधा देने वाली बैंक
  •   सारस्वत कोऑपेरटिव बैंक लिमिटेड- कार लोन देने वाली अनुसूचित बैंक
  •   एसबीआई कैपीटल मार्केट्स लिमिटेड
  •   स्माल इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया- लघु उ ोगों को ऋण देने वाला बैंक
  •   स्टेट बैंक ऑफ हैदराबाद
  •   स्टेट बैंक ऑफ इंडिया
  •   स्टेट बैंक ऑफ इंदौर
  •   स्टेट बैंक ऑफ मैसूर
  •   स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र
  •   स्टेट बैंक ऑफ त्रावणकोर
  •   सिंडीकेट बैंक
  •   यूनाईटेड कॉमर्शियल बैंक
  •   यूनियन बैंक ऑफ इंडिया
  •   यूनिट ट्रस्ट ऑफ इंडिया
  •   यूनाईटेड बैंक ऑफ इंडिया
  •   विजया बैंक


निजी बैंक

वर्ष 1993 में बैंकिंग प्रणाली में अधिक उत्पादकता और कुशलता लाने के लिए भारतीय बैंकिंग प्रणाली में निजी क्षेत्र को नए बैंक खोलने की अनुमति दी गई। इन बैंकों को अन्य बातों के साथ निम्नलिखित न्यूनतम शर्तों को पूरा करना था-
(
i) यह बैंक एक पब्लिक लि. कंपनी के रूप में पंजीकृत हो;  (ii) न्यूनतम प्रदत्त पूँजी 100 करोड़ रु. हो, बाद में इसे बढ़ाकर 200 करोड़ कर दिया गया; (iii) इसके शेयर स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हों; (iv) बैंक का कामकाज, हिसाब-किताब या लेखा तथा अन्य नीतियाँ भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा निर्धारित विवेकपूर्ण मानकों के अनुरूप हों।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक

प्रथम राष्ट्रीयकरण- 19 जुलाई, 1969 को 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया-

  •   बैंक ऑफ इंडिया
  •   यूनियन बैंक ऑफ इंडिया
  •   बैंक ऑफ बड़ौदा
  •   बैंक ऑफ महाराष्ट्र
  •   पँजाब नेशनल बैंक
  •   इंडियन बैंक
  •   इंडियन ओवरसीज़ बैंक
  •   सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया
  •   केनरा बैंक
  •   सिंडीकेट बैंक
  •   यूनाइटेड कॉमर्शियल बैंक
  •   इलाहाबाद बैंक
  •   यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया
  •   देना बैंक

द्वितीय राष्टरीयकरण- 15 अप्रैल, 1980 को 6 अन्य बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया-

  •   आंध्र बैंक
  •   कॉर्पोरेशन बैंक
  •   न्यू बैंक ऑफ इंडिया
  •   ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स
  •   पँजाब एंड सिंध बैंक
  •   विजया बैंक

अक्टूबर 1993 में न्यू बैंक ऑफ इंडिया का विलय पँजाब नेशनल बैंक में  कर दिया गया। वर्तमान में  देश में 19 राष्ट्रीयकृत बैंक हैं।

स्टॉक मार्केट

भारतीय स्टॉक मार्केट में कुल 22 स्टॉक एक्सचेंज हैं। इनमें से बांबे स्टॉक एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज और ओवर द काउंटर स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया प्रमुख स्टॉक एक्सचेंज हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के अनुसार देश में 13 अगस्त 2009 तक कुल 1680 पंजीकृत विदेशी संस्थागत निवेशक थे। इस अवधि तक इन निवेशकों ने कुल 65.5 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश किया था।

ब्लूमरैंग द्वारा जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार 31 दिसंबर 2009 तक भारतीय स्टॉक मार्केट का कुल बाजार पूंजीकरण विश्व के कुल बाजार पूंजीकरण का 2.8 प्रतिशत था। वर्ष 2009 के दौरान कुल 4.18 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के 21 आईपीओ बाजार में उतारे गये जबकि इसकी तुलना में 2008 में कुल 3.62 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के 36 आईपीओ जारी किये गये।

बांबे स्टॉक एक्सचेंज

बांबे स्टॉक एक्सचेंज की स्थापना 1875 में की गई थी। यह एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है। अधिसूचित कंपनियों के लिहाज से बीएसई विश्व का पहले नंबर का स्टॉक एक्सचेंज है। इसमें कुल 5,500 कंपनियां अधिसूचित हैं। 31 दिसंबर 2007 तक इसका कुल बाजार पूंजीकरण 1.79 खरब अमेरिकी डॉलर था। बीएसई का सूचकांक सेंसेक्स 30 कंपनियों के शेयरों से निर्धारित होता है। इसमें सीमेंट, दूरसंचार, रियल इस्टेट, बैंकिंग, आईटी, निर्माण, आटोमोबाइल, ऑयल, फार्मास्युटिकल्स, ऊर्जा और स्टील क्षेत्र की प्रमुख कंपनियां शामिल हैं। सेंसेक्स में शामिल प्रमुख कंपनियां हैं- इंफोसिस टेक्नोलॉजीस, रिलायंस, टाटा स्टील, टाटा पावर, टाटा मोटर्स। एक्सचेंज में कुल 22 सूचकांक हैं जिसमें 12 सेक्टर शामिल हैं।

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज

प्रतिदिन के टर्नओवर के लिहाज से नेशनल स्टॉक एक्सचेंज देश का सबसे बड़ा सिक्योरिटी एक्सचेंज है। 19 मई, 2009 को एनएसई का कुल टर्नओवर 8.33 अरब रु. था। 1992 से ही एनएसई में एक एडवांस्ड आटोमेटेड इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग सिस्टम है जिसे देश के 1486 जगहों से एक्सेस किया जा सकता है। जून 1994 से एनएसई ने थोक ऋण बाजार सेगमेंट में अपना ऑपरेशन शुरू कर दिया था। नवंबर 1994 से इक्विटी सेगमेंट की शुरूआत हो गई जबकि डेरीवेटिव्स सेगमेंट की शुरूआत जून 2000 से हो गई। निफ्टी एक्सचेंज में 20 बैंक और बीमा कंपनियां शामिल हैं।

निफ्टी सूचकांक का निर्धारण 21 उ ोगों की 50 कंपनियों द्वारा होता है। इसमें सीमेंट, दूरसंचार, फार्मास्युटिकल्स, बैंकिंग, आटोमोबाइल, निर्माण, अल्युमिनियम, तेल खोज, गैस व वित्त क्षेत्र की कंपनियां शामिल हैं। प्रमुख कंपनियों में भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स, भारती एयरटेल, केर्न इंडिया, गेल, हीरो होंडा मोटर्स, हिंदुस्तान यूनीलीवर, हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कार्पोरेशन और इंफोसिस टेक्नोलॉजीस शामिल हैं।

ओवर द काउंटर एक्सचेंज

1990 में स्थापित ओवर द काउंटर एक्सचेंज ऑफ इंडिया देश का एकमात्र ऐसा एक्सचेंज है जो पिछले तीन साल से कार्यरत लघु व मध्यम श्रेणी की कंपनियों को कैपीटल मार्केट से पैसे उठाने में मदद देता है।

भारतीय प्रतिभूति व विनिमय बोर्ड

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) की स्थापना 12 अप्रैल 1992 को भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के तहत की गई। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड देश का सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज है। एनएसई प्रतिभूति बाजार में परिवर्तन के लिए एजेंडा तय करने में लगा हुआ है। पिछले पांच वर्र्षों में सेबी के प्रयासों की वजह से देश के 363 शहरों के निवेशक बाजार से ऑनलाइन जुड़े हैं। साथ ही बाजार में पूर्ण पारदर्शिता, वित्तीय लेन-देन के निपटारे की गारंटी, वैज्ञानिक तरीके से डिजाइन और व्यावसायिक तौर से प्रबंधित संकेतकों का प्रचलन और देश भर में डिमैट का प्रचलन संभव हो सका है।

भारतीय मौद्रिक नीति (Indian Monetary Policy)

भारतीय मौद्रिक नीति के दो स्पष्टï उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(
I) आर्थिक विकास को तेज करना; और
(
II) मुद्रास्फीतिकारी दबावों को नियंत्रित करना

भारतीय रिज़र्व बैंक मौद्रिक नीति को लागू करने की मुख्य एजेंसी है। भारतीय रिज़र्व बैंक  द्वारा स्थिर मौद्रिक नीति प्राप्त करने के लिए प्रयुक्त किए उपायों में निम्नलिखित शामिल हैं-

बैंक दर

यह वो दर है जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक विनिमय के  बिलों पर दोबारा कमीशन लेता है व्यवहार्यत:, यह वह दर है जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक अन्य वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है। अत: यह मौद्रिक नीति अर्थव्यवस्था के एक संकेत के रूप में कार्य करती है। 

आरक्षित नकदी निधि अनुपात (सी आर आर)

प्रत्येक वाणिज्यिक बैंक को भारतीय रिज़र्व बैंक के पास (या तो नकदी अथवा बही शेष) अपनी माँग और आवधिक देयताओं (जमा) का कुछ प्रतिशत रखना अपेक्षित होता है। भारतीय रिज़र्व बैंक को 3 से 15 प्रतिशत के बीच सी आर आर निर्धारित करने का अधिकार है। 

सावधिक चलननिधि अनुपात (एस. एल. आर.)

वाणिज्य बैंकों द्वारा अपनी कुल माँग और आवधिक देयताओं (एन. डी. सी. एल.) का कुछ प्रतिशत (सी आर आर के अतिरिक्त) नकद, सोना और अनुमोदित प्रतिभूतियों की अवस्था में नकद (लिक्विड) परिसम्पत्तियों के रूप में रखना भी अपेक्षित होता है। 

भारतीय रिज़र्व बैंक

भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के  अंतर्गत 1 अप्रैल, 1935 को हुई थी और एक जनवरी, 1949 को इसका राष्टï्रीयकरण किया गया। रिज़र्व बैंक के उद्देश्य इस प्रकार हैं-बैंक नोट जारी करने का एकमात्र अधिकार, देश का विदेशी मुद्रा भंडार रखना, मुद्रा और ऋण प्रणाली का परिचालन करना ताकि देश में मुद्रा की स्थिरता बनी रहे और देश के आर्थिक व सामाजिक उद्देश्यों और नीतियों को ध्यान में रखते हुए देश के वित्तीय ढाँचे का सुदृढ़ तरीके से विकास करना। रिज़र्व बैंक भारत सरकार, राज्य सरकारों, वाणिज्यिक बैंकों, राज्य सहकारी बैंकों और कुछ वित्तीय संस्थाओं के बैंकर के रूप में कार्य करती है।

पूंजी बाजार

रिजर्व बैंक

भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1 अप्रैल, 1935 में की गई थी। 1 जनवरी 1949 को इसका राष्ट्रीयकरण किया गया। देश में एक रुपये के सिक्कों और नोटों और छोटे सिक्कों को छोड़कर अन्य मुद्रा जारी करने का एक मात्र अधिकार रिजर्व बैंक को ही प्राप्त है। केंद्र सरकार के एजेंट के रूप में रिजर्व बैंक भारत सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले एक रुपये के नोटों, सिक्कों तथा छोटे सिक्कों के वितरण का कार्य करता है। रिजर्व बैंक केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के साथ किए गये अनुबंधों के अनुसार उनके बैंकर के रूप में कार्य करता है। रिजर्व बैंक केंद्र और राज्य सरकारों के उधारी कार्यक्रम का संचालन करता है। यह ऋण के समुचित उपभोग से मूल्यों में स्थिरता लाने के साथ-साथ उत्पादन बढ़ाने के लिए मुद्रा नीति तैयार करता है और उसे लागू करता है। रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में व्यवस्था बनाये रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत की सदस्यता के नाते सरकार के एजेंट के रूप में कार्य करता है। यह विकास और संवद्र्धन के विभिन्न कार्र्यों के अतिरिक्त वाणिज्यिक बैंकिंग व्यवस्था, शहरी सहकारी बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र का नियमन तथा निरीक्षण भी करता है।

रिजर्व बैंक के कार्र्यों का नियंत्रण केंद्रीय निदेशक मंडल के एक बोर्ड़ द्वारा किया जाता है। बोर्ड की नियुक्ति भारत सरकार द्वारा भारतीय बैंक अधिनियम के नियमों के अधीन की जाती है।

वित्तीय संस्थान

भारत में निम्नलिखित वित्तीय संस्थान जो विभिन्न क्षेत्रों को देखते हैं:

  •   भारतीय क्रेडिट रेटिंग सूचना सेवा लिमिटेड (क्रिसिल)
  •   भारतीय निवेश सूचना और क्रेडिट रेटिंग एजेंसी (आईसीआर भारत)
  •   बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीए)
  •   ोगिक और वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड (बीआईएफआर)
  •   भारत की निर्यात-आयात बैंक
  •   राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड)
  •   भारतीय लघु उ ोग विकास बैंक (सिडबी)
  •   राष्ट्रीय आवास बैंक (एनएचबी)

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड

भारत में प्रत्यक्ष कर से संबंधित सभी मामले 1 जनवरी 1964 से केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को सौंप दिए गए और इसे राजस्व बोर्ड अधिनियम 1963 से अधिकार प्राप्त हैं। सीबीडीटी वित्त मंत्रालय में राजस्व विभाग का एक हिस्सा है। एक ओर सीबीडीटी भारत में प्रत्यक्ष कर की नीतियां और योजनाओं के लिए आवश्यक निविष्टियां प्रदान करता है वहीं दूसरी ओर यह आयकर विभाग के माध्यम से प्रत्यक्ष कर कानूनों के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है।

केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड

केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अधीन राजस्व विभाग का एक हिस्सा है। यह लेवी और केंद्रीय उत्पाद शुल्क व सीमाs शुल्क की वसूली से संबंधित नीतियां तैयार करता है। साथ ही सीबीईसी के अधिकार क्षेत्र में आने वाले प्रशासन से संबंधित तस्करी की रोकथाम और सीमा शुल्क, केंद्रीय उत्पाद शुल्क और नारकोटिक्स से संबंधित मामले देखता है। बोर्ड कस्टम हाउसेज, केंद्रीय उत्पाद शुल्क आयुक्तालय और केंद्रीय राजस्व नियंत्रण प्रयोगशाला सहित अपने अधीनस्थ संगठनों का प्रशासनिक प्राधिकरण है।

राजस्व

राजस्व विभाग राजस्व से संबंधित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के मामलों पर दो सांविधिक बोर्र्डों केद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड और केद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड के माध्यम से नियंत्रण रखता है। इस विभाग को विधेयक में लिखित केद्रीय विक्रय कर, स्टाम्प ड्यूटी, तस्कर और विदेशी मुद्रा की हेरा-फेरी करने वाली की संपत्ति जब्त करने, और अन्य वित्तीय संबंधित मामलों में प्रशासनिक और नियामक उपायों को लागू करने की शक्तियां दी गई है। इसे अफीम और उसके उत्पादों के उत्पादन और बिक्री के मामले में भी नियंत्रण रखने का अधिकार दिया गया है।

वित्त

वित्त मंत्रालय सरकार का वित्तीय प्रशासन देखता है। यह उन सभी वित्तीय मामलों से संबंद्ध है जिनका प्रभाव समूचे देश पर पड़ता है। इसमें विकास और अन्य कार्र्यों के लिए संसाधन जुटाना शामिल है। यह सरकार के व्यय का निगमन करता है, जिसमें राज्यों को हस्तांतरित किए जाने वाले संसाधन भी शामिल हैं।
इस मंत्रालय के चार विभाग हैं: (1) आर्थिक मामले (2) व्यय (3) राजस्व (4) विनिवेश।

आर्थिक मामले
आर्थिक मामले से संबंधित मुख्य विभाग हैं:

  •   वित्त प्रभाग
  •   बजट प्रभाग
  •   बैंकिंग और बीमा प्रभाग
  •   पूंजी बाजार
  •   द्विपक्षीय सहयोग
  •   विदेश व्यापार
  •   फंड बैंक प्रभाग
  •   राजकोषीय दायित्व एवं बजट प्रबंधन और प्रशासन
  •   सहायता लेखा और लेखा परीक्षा प्रभाग
  •   आर्थिक प्रभाग

यह विभाग अन्य कार्य करने के साथ चालू आर्थिक प्रवृत्तियों पर नजर रखता है तथा सरकार को देश की आंतरिक और विदेशी आर्थिक व्यवस्था के विभिन्न विषयों पर जैसे- मूल्य, ऋण, राजकोषीय एवं मुद्रा नीति तथा पूंजी निवेश नियमन आदि पर परामर्श देता है। यह विभाग राष्ट्रीयकृत बैंकों, जीवन एवं सामान्य बीमा संबंधी नीतियों की देखरेख करता है। इसके अतिरिक्त यह विभाग भारत सरकार की टकसाल और मुद्रा मुद्रणालयों, सिक्यूरिटी प्रेसों और सिक्यूरिटी पेपर मिलों का प्रबंधन भी संभालता है। खा एवं कृषि संगठनों (एफएओ), अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ), संयुक्त राष्ट्र औगिक विकास संगठन (यूएनआईडीओ) जैसे विशेष अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के जरिए मिलने वाली सहायता और विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी, संस्कृति एवं शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट अंतर्राष्ट्रीय या द्विपक्षीय समझौते के अंतर्गत प्राप्त सहायता को छोड़कर शेष सभी विदेशी तथा तकनीकी सहायता पर भी यह विभाग नजर रखता है। आर्थिक कार्य विभाग केद्रीय बजट और राष्ट्रपति शासन वाले राज्यों तथा केद्रशासित प्रदेशों के बजट तैयार करके उन्हें संसद में पेश करता है।

विदेशी ऋण

मध्य मार्च 2009 में भारत का कुल विदेशी ऋण 224.59 अरब अमेरिकी डॉलर था (रु. 1,142,618 करोड़) जो पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में थोड़ा ज्यादा है (224.41 अरब अमेरिकी डॉलर या 897,314 करोड़ रु.)।

सामाजिक क्षेत्र

वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान ग्लोबल आर्थिक संकट को देखते हुए सरकार ने देश की आम जनता को राहत देने के लिए कई कदम उठाए व कल्याणकारी कार्यक्रम शुरू किये। आलोच्य वित्त वर्ष के दौरान केद्र सरकार का ग्रामीण विकास सहित सामाजिक सेवाओं में खर्च कुल खर्च (आयोजना व गैर-आयोजना) का 19.46 प्रतिशत रहा। इसकी तुलना में सामाजिक क्षेत्र में खर्च 2003-04 के दौरान कुल खर्च का मात्र 10.46 प्रतिशत ही था।

प्रतिव्यक्ति वृद्धि

प्रतिव्यक्ति आय और उपभोग में वृद्धिदर जो सामान्यतया सकल कल्याण का पैमाना माने जाते हैं, में पिछले दो वर्षों में गिरावट दर्ज की गई है। इसके पीछे सबसे बड़ा हाथ सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट का है। प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धिदर जिसे स्थिर बाजार मूल्यों पर सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर मापा जाता है, 2008-09 में 3.7 प्रतिशत रही। इसकी तुलना में वित्त वर्ष 2007-08 में यह वृद्धि दर 8.1 प्रतिशत रही थी। बाद में वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान प्रतिव्यक्ति आय में वृद्धि दर बढ़कर 5.3 प्रतिशत हो गई। जहां तक उपभोग का संबंध है, इसमें वित्त वर्ष 2007-08 से लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। 2009-10 में इस क्षेत्र में वृद्धि दर गिरकर 2007-08 की तुलना में मात्र एक-तिहाई रह गई है।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश

वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का कुल अंतप्र्रवाह 25,888 मिलियन डॉलर रहा। औद्योगिक नीति विभाग के अनुसार अगस्त 1991-मार्च 2010 के मध्य भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का कुल अंतप्र्रवाह 1,32,428 मिलियन डॉलर रहा है।

सेवा क्षेत्र जिसमें वित्तीय और गैर-वित्तीय सेवाएं शामिल हैं, ने देश में आये हुए कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश इक्विटी का 21 प्रतिशत प्राप्त किया। देश में वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान इस क्षेत्र में कुल 4,392 मिलियन अमेरिकी डॉलर का अंतप्र्रवाह रहा। विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के मामले में निर्माण क्षेत्र जिसमें परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्ग शामिल हैं, में कुल 2,868 मिलियन अमेरिकी डॉलर का विदेशी निवेश प्राप्त हुआ। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में इस क्षेत्र का दूसरा स्थान रहा। इस मामले में हाउसिंग व रियल इस्टेट का स्थान तीसरा रहा जिसने कुल 2,844 मिलियन अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त किया। दूरसंचार क्षेत्र में इस वित्त वर्ष के दौरान कुल 2,554 मिलियन अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आया।

जनवरी-मई 2010 के मध्य कार्पोरेट विलय व अधिग्रहण और प्राइवेट इक्विटी ट्रांजेक्शन पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में दोगुना हो गया। जनवरी-मई 2010 के मध्य देश में कुल 439 कार्पोरेट विलय व अधिग्रहण और प्राइवेट इक्विटी ट्रांजेक्शन के मामले हुए जिनका कुल मूल्य 30 अरब अमेरिकी डॉलर रहा।

विदेशी मुद्रा कोष

रिजर्व बैंक के वीकली स्टेटिस्टिकल सप्लीमेंट के अनुसार 4 जून 2010 को समाप्त सप्ताह के दौरान भारत का विदेशी मुद्रा कोष 271.09 अरब अमेरिकी डॉलर का था जो कि पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 9.88 अरब अमेरिकी डॉलर अधिक है।

विदेशी संस्थागत निवेश

मई 2010 में देश में कुल पंजीकृत विदेशी संस्थागत निवेशकों की संख्या 1710 थी और जनवरी-मई 2010 के दरमियान इक्विटी में कुल विदेशी संस्थागत निवेश 4606.50 मिलियन अमेरिकी डॉलर रहा। 1 जून से 14 जून 2010 के  मध्य विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इक्विटी में कुल 530.05 मिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश किया।

पूंजीगत वस्तुएं

पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन में इस दौरान 72.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि के दौरान इस क्षेत्र में 5.9 प्रतिशत की नकारात्मक वृद्धि दर दर्ज की गई थी। उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं के उत्पादन में 37 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई जिससे साफ जाहिर है कि टेलीविजन और फ्रिज जैसी वस्तुओं की खरीद देश में लगातार बढ़ रही है।

औद्योगिक उत्पादन

अप्रैल 2010 में औद्योगिक उत्पादन में 17.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में विनिर्माण सेक्टर का कुल योगदान 80 प्रतिशत है, की वृद्धि दर अप्रैल 2010 के दौरान 19.4 प्रतिशत रही। इसकी तुलना में अपै्रल 2009 के दौरान यह वृद्धि दर मात्र 0.4 प्रतिशत थी।

विभिन्न क्षेत्र में प्रगति

वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में खनन में  (10.6 प्रतिशत), विनिर्माण में (10.8 प्रतिशत), विद्युत, गैस और जल सप्लाई में (6.5 प्रतिशत), निर्माण में (6.5 प्रतिशत), वाणिज्य, होटल, परिवहन और दूरसंचार में (9.3 प्रतिशत), वित्तयन, बीमा, रियल इस्टेट और बिजीनेस सेवाओं में (9.7 प्रतिशत), सामुदायिक, सामाजिक और व्यक्तिगत सेवाओं में (5.6 प्रतिशत) वृद्धि हुई। वित्त वर्ष 2009-10 में सकल राष्ट्रीय आय में 7.3 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान लगाया गया, जबकि वित्त वर्ष 2008-09 के दौरान यह वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत थी। वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान प्रतिव्यक्ति आय में 5.6 प्रतिशत की दर से वृद्धि का अनुमान लगाया गया है।

सकल घरेलू उत्पादन

सांख्यिकीय एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अनुमानों के अनुसार वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रही। इस वित्त वर्ष की चौथी तिमाही के दौरान वृद्धि दर 8.6 प्रतिशत रही। इस शानदार वृद्धि दर के पीछे मुख्य कारण विनिर्माण क्षेत्र का शानदार प्रदर्शन रहा जिसे सरकार के रवैये से बढ़ावा मिला। वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान 7.4 प्रतिशत की सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर सरकार द्वारा अनुमानित 7.2 प्रतिशत से ज्यादा रही। सरकार द्वारा जारी किये गये आंकड़ों के अनुसार जनवरी-मार्च 2010 के दौरान विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 16.3 प्रतिशत रही।

पंचायती राज

पंचायती राज

सत्ता के विकेन्द्रीयकरण के लिए भारत के विभिन्न राज्यों में गाँव एवं जिलों के स्थानीय स्वशासन की त्रिस्तरीय व्यवस्था है।  इस संदर्भ में संविधान (72वां तथा 73वां संशोधन) अधिनियम '92 द्वारा इन्हें संवैधानिक स्थिति प्रदान की गई है। पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष तय किया गया है। इस नई पंचायती राज व्यवस्था के तीन अंग हैं:-

(1) ग्राम पंचायत

(2) पंचायत समिति

(3) जिला परिषद

परन्तु कुछ राज्यों  में इस त्रिस्तरीय व्यवस्था के स्थान पर केवल द्विस्तरीय व्यवस्था पाई जाती है। पंचायती राज का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण स्वशासन की संस्थाओं को नियोजन एवं विकास की प्रक्रियाओं एवं कार्यक्रमों में सक्रिय रूप से भागीदारी बनाना है।

चुनाव आयोग

संसद और प्रत्येक राज्य के विधानमंडल निर्वाचन के लिए नामावली तैयार कराने, उनके निर्वाचनों के संचालन तथा राष्टरपति और उपराष्टरपति के निर्वाचन के अधीक्षण, निर्देशन का दायित्व निर्वाचन आयोग को दिया गया है जो कि संविधान के अनुच्छेद 324 (1) के अनुसार गठित एक संवैधानिक प्राधिकरण है।

राज्यों का स्वरूप

कार्यपालिका

राज्य संघ के संविधान से शासित होते हैं। यह प्रावधान संविधान में निर्दिष्टï अनुच्छेद 370 के अनुसार जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए लागू नहीं है। वहाँ संविधान अनुपालन हेतु विशेष उपबंध हैं। राज्यों की कार्यपालिका के प्रमुख संघटक इस प्रकार हैं-

राज्यपाल

राज्य की कार्यपालिका के अन्तर्गत राज्यपाल तथा मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिपरिषद् होती है। राज्यपाल की नियुक्ति भारत का राष्टरपति पाँच वर्ष की अवधि के लिए करता है और उसका कार्यकाल राष्टरपति की इच्छा पर निर्भर करता है। 35 वर्ष से अधिक आयु वाले केवल भारतीय नागरिक को ही इस पद पर नियुक्त किया जा सकता है। राज्य की कार्यपालिका के सारे अधिकार राज्यपाल में निहित होते हैं।
मुख्यमंत्री के नेतृत्व में  मंत्रिपरिषद्, राज्यपाल को उनके कार्यों में सहायता करती है और सलाह देती है। सभी राज्यों  में संवैधानिक तंत्र की असफलता की रिपोर्ट राष्टï्रपति को भेजने अथवा राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी भी प्रस्ताव को स्वीकृति देने से सम्बन्धित मामलों में स्वेच्छा और स्वविवेक से निर्णय लेना होता है।

मंत्रिपरिषद

मुख्यमंत्री राज्यपाल के द्वारा नियुक्त किया जाता है तथा उसी के द्वारा  मुख्यमंत्री की सलाह से अन्य मंत्रियों की भी नियुक्ति की जाती है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

विधानमंडल

प्रत्येक राज्य में एक विधानमंडल होता है, जिसके अंतर्गत राज्यपाल के अतिरिक्त एक या दो सदन होते हैं। बिहार, महाराष्टर, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर और उत्तर प्रदेश में विधानमंडल के दो सदन हैं जिन्हें विधान परिषद और विधानसभा कहते हैं। शेष राज्यों में विधानमंडल का केवल एक ही सदन है, जिसे विधानसभा कहा जाता है।

विधान परिषद

प्रत्येकराज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के एक तिहाई से अधिक तथा किसी भी स्थिति में 40 से कम नहीं होगी (संविधान की धारा 50 के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर विधान परिषद में 36 सदस्य हैं)।

विधानसभा

किसी राज्य की विधानसभा में अधिक से अधिक 500 तथा कम से कम 60 सदस्य होते हैं (संविधान के अनुच्छेद 371 के अनुसार सिक्किम विधानसभा में 32 सदस्य हैं)। इनका निर्वाचन उस राज्य के प्रत्येक क्षेत्रीय निर्वाचन-क्षेत्रों से  मतदान द्वारा होता है। विधानसभा का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है, बशर्ते वह पहले भंग न कर दी जाए।

केन्द्र शासित प्रदेश

केन्द्र शासित प्रदेशों का शासन राष्टरपति द्वारा चलाया जाता है। अंडमान-निकोबार, दिल्ली और पुदुचेरी के प्रशासकों को उपराज्यपाल कहा जाता है, जबकि चंडीगढ़ का प्रशासक मुख्य आयुक्त कहलाता है। राष्टरीय राजधानी दिल्ली और केन्द्रशासित प्रदेश पुदुचेरी की अपनी-अपनी विधानसभाएं और मंत्रिपरिषद हैं।

संघ का स्वरूप

कार्यपालिका (Executive)

संघीय कार्यपालिका के अन्तर्गत राष्टरपति, उपराष्टरपति तथा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिपरिषद होती है, जो राष्टरपति को सलाह देती है।

राष्टरपति

राष्टरपति का निर्वाचन एक निर्वाचक मंडल के सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधि प्रणाली के आधार पर एकल संक्रमणीय मत द्वारा करते हैं। इस निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों तथा राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य होते हैं। राष्टरपति को अनिवार्य रूप से भारत का नागरिक, कम से कम 35 वर्ष की आयु तथा लोकसभा का सदस्य बनने का पात्र होना चाहिए। राष्टरपति का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है। वह इस पद पर पुन: भी चुना जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 61 में निहित कार्यविधि के अनुसार राष्टरपति को महाभियोग द्वारा उसके पद से हटाया जा सकता है। वह उपराष्टरपति को सम्बोधित स्व-हस्तलिखित पत्र द्वारा पदत्याग कर सकता है।

रक्षा सेनाओं की सर्वोच्च कमान भी राष्टरपति के पास होती है। राष्टरपति को संसद का अधिवेशन बुलाने, उसे स्थगित करने, उसमें भाषण देने और उसे संदेश भेजने, लोकसभा भंग करने, दोनों सदनों के अधिवेशन काल को छोड़कर किसी भी समय अध्यादेश जारी करने, क्षमादान देने, दंड   देने के अधिकार प्राप्त हैं।

उपराष्टरपति

उपराष्टरपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा एक निर्वाचक मंडल के सदस्य करते हैं। उसमें संसद के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। उपराष्टरपति को अनिवार्य रूप से भारत का नागरिक, कम से कम 35 वर्ष की आयु का और राज्यसभा का सदस्य बनने का पात्र होना चाहिए। उसका कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है और वह इस पद के लिए   पुन: चुना जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 67 (ख) में निहित कार्यविधि द्वारा उसे पद से हटाया जा सकता है।

उपराष्टरपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। जब राष्टï्रपति, बीमारी या अन्य किसी कारण से अपना कार्य करने में असमर्थ हो गया हो, तब नए राष्टï्रपति को चुने जाने तक वह कार्यवाहक राष्टरपति के रूप में कार्य करता है। ऐसी स्थिति में वह राज्यसभा के सभापति के रूप में कार्य करना बंद कर देता है।

मंत्रिपरिषद्
कार्य संचालन में राष्टरपति की सहायता करने तथा उसे परामर्श देने के लिए प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक मंत्रिपरिषद् की व्यवस्था है। प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्टरपति करता है तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति भी राष्टरपति, प्रधानमंत्री के परामर्श से करता है। मंत्रिपरिषद् संयुक्त रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

मंत्रिपरिषद् में तीन तरह के मंत्री होते हैं

(1) कैबिनेट मंत्री (वे मंत्री जो मंत्रिमंडल के सदस्य होते हैं),

(2) राज्यमंत्री (जो विभाग का स्वतंत्र रूप से कार्यभार संभाले हुए हों) और

(3) राज्यमंत्री।

विधायिका (Legislature)

 संघ की विधायिका को संसद कहा जाता है। इसमें राष्ट्रपति और संसद के दोनों सदन लोकसभा तथा राज्यसभा शामिल हैं। संसद की बैठक पिछली बैठक के छ: महीने बाद तक अवश्य बुलानी होती है। कुछ मौकों पर दोनों सदनों का संयुक्त अधिवेशन बुलाया जाता है।

लोकसभा

लोकसभा के सदस्य वयस्क मताधिकार के आधार पर लोगों द्वारा सीधे चुने जाते हैं। संविधान में इस समय लोकसभा के 552 सदस्यों का प्रावधान है। इनमें 530 सदस्य राज्यों और 20 सदस्य केन्द्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं। राष्टï्रपति को एंग्लो इंडियन समुदाय के दो व्यक्तियों को मनोनीत करने का अधिकार है।
लोकसभा का कार्यकाल, यदि उसे भंग न किया जाए तो, सदन की पहली बैठक की तिथि से लेकर 5 वर्ष होता है। किंतु यदि आपातस्थिति लागू हो तो यह अवधि संसद द्वारा बढ़ाई जा सकती है किंतु ऐसा कुछ शर्र्तों के साथ ही किया जा सकता है।

राज्यसभा

इस समय राज्यसभा के 245 सदस्य हैं। इनमें से 233 सदस्य राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं और 12 सदस्य राष्टरपति द्वारा मनोनीत हैं। राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव सम्बन्धित विधानसभाओं के चुने हुए सदस्यों द्वारा एकल संक्रमणीय मत के आधार पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए किया जाता है। राज्यसभा कभी भी भंग नहीं होती और उसके एक तिहाई सदस्य हर दो वर्ष बाद अवकाश  ग्रहण करते हैं।

मौलिक कत्र्तव्य (Fundamental Duties)

सन् 1976 में भारतीय संविधान में किए गए संशोधन के माध्यम से भाग 4-क (अनुच्छेद 51 क) जोड़ा गया, जिसमें नागरिकों के लिए दस मूल कत्र्तव्यों का प्रावधान किया गया। इसके अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक का कत्र्तव्य होगा कि वह

(1) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्टरध्वज और राष्टरगान का आदर करे

(2) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्टरीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे

(3) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे

(4) देश की रक्षा करे और आह्वन किए जाने पर राष्टर की सेवा करे

(5) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेद भाव से परे हों, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हों

(6) सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे

(7) प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा तथा प्राणि मात्र के प्रति दया भाव

(8) वैज्ञानिक दृष्टिïकोण, मानववाद, ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास

(9) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे।

(10) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढऩे का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाईयों को छू ले।

 

मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)

संविधान के तीसरे भाग के अनुच्छेद 12 से 35 तक में मौलिक अधिकारों का उल्लेख किया गया है। ये मौलिक अधिकार हैं :

(1) समानता का अधिकार : कानून की समानता तथा कानून के समक्ष समानता, धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध और रोजगार के लिए समान अवसर |

(2) विचारों की अभिव्यक्ति, सम्मेलन करने, संस्था या संघ बनाने, भारत में सर्वत्र आने-जाने, भारत के किसी भी भाग में रहने तथा कोई वृत्ति या व्यवसाय करने का अधिकार (इनमें से कुछ अधिकार राज्य की सुरक्षा, विदेशों के साथ मित्रतापूर्ण संबंधों, लोक-व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के अधीन हैं),

(3) शोषण से रक्षा का अधिकार : इसके अंतर्गत सभी प्रकार के बालश्रम और व्यक्तियों के क्रय-विक्रय को अवैध करार दिया गया है,

(4) अंत:करण की प्रेरणा तथा धर्म को निर्बाध रूप से मानने, उसके अनुरूप आचरण करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता का अधिकार,

(5) नागरिकों के किसी वर्ग को अपनी संस्कृति, भाषा और लिपि का संरक्षण करने तथा अल्पसंख्यकों द्वारा पसन्द की शिक्षा ग्रहण करने एवं शिक्षा संस्थाओं की स्थापना करने और उन्हें चलाने का अधिकार, और

(6) मूल अधिकारों को लागू करने के लिए संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

एक समान नागरिकता (Nationality)

संविधान में संपूर्ण भारत के लिए एक समान नागरिकता की व्यवस्था की गई है। ऐसा प्रत्येक व्यक्ति भारत का नागरिक माना गया है जो संविधान के लागू होने के दिन (26 जनवरी 1950 को) भारत का अधिशासी था और (क) भारत में पैदा हुए थे, या (ख) जिसके माता-पिता में से एक भारत में पैदा हुआ था या (ग) जो उस तारीख से ठीक पहले सामान्यतया कम से कम पाँच वर्ष से भारतीय क्षेत्र में रह रहा था। नागरिकता अधिनियम 1955 में संविधान लागू होने के पश्चात नागरिकता ग्रहण करने तथा समाप्त करने के सम्बन्ध में प्रावधान दिए गए हैं। 


भारतीय संविधान (Constitution of India)

19 अगस्त 1947 को भारतीय संविधान के निर्माण के लिए संविधान सभा की प्रारूप समिति गठित हुई। डा. भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में बारहवाँ अधिवेशन 24 जनवरी 1950 को हुआ। संविधान सभा के पहले अस्थायी अध्यक्ष सच्चिदानन्द सिन्हा और पहले स्थायी अध्यक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद तथा बी. एन. राव संवैधानिक सलाहकार थे। 26 जनवरी, 1950 को देश में संविधान लागू हो गया।

संविधान की विशेषताएं
भारत का संविधान कोई मौलिक  दस्तावेज नहीं है। भारतीय संविधान पर ब्रिटिश, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी, जापान, आयरलैण्ड, द. अफ्रीकी तथा फ्रांसीसी संविधान का संयुक्त प्रभाव है। संविधान की मुख्य विशेषताएं इसका लिखित व निर्मित होना, अद्र्ध कठोर व अद्र्ध नमनीयता, केन्द्रीकृत संघात्मक व्यवस्था, प्रभुत्व संपन्न समाजवादी, पंथ निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य की व्यवस्था होना, संसदात्मकता, न्यायिक पुर्नविलोकनीयता व नागरिकों के मूलाधिकारों का प्रावधान होना मानी जाती है। संविधान के अधीन समस्त अधिकार भारतीय जनता में ही निहित हैं। कार्यपालिका, विधायिका व न्यायपालिका इसके तीन स्तंभ हैं। 

भारतीय संविधान में शासन के लिए ब्रिटिश प्रणाली पर आधारित पद्धति की व्यवस्था है। संसदीय सरकार के संविधान का ढाँचा एकात्मक विशेषताओं के साथ-साथ संघात्मक है। भारत का राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख होता है। संविधान का अनुच्छेद 74 (1) यह निर्दिष्ट करता है कि कार्य संचालन में राष्ट्रपति की सहायता करने तथा उसे परामर्श देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी तथा राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के परामर्श से ही कार्य करेगा। इस प्रकार कार्यपालिका की वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गठित मंत्रिपरिषद में निहित है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी है। 

संविधान में विधायी शक्ति को संसद एवं राज्य विधानसभाओं में बाँटा गया है तथा शेष शक्तियाँ संसद को प्राप्त हैं। संविधान में संशोधन का अधिकार भी संसद  को ही प्राप्त है।

न्यायपालिका, भारत के नियंत्रक तथा महालेखा परीक्षक, लोकसेवा  आयोगों  और  मुख्य  निर्वाचन आयुक्त की स्वतंत्रता  बनाए  रखने  के लिए संविधान  में प्रावधान है।

राष्ट्रीय प्रतीक


राष्ट्रीय ध्वज
भारत के राष्ट्रीय ध्वज में तीन रंग हैं। राष्टरीय ध्वज में समान अनुपात में तीन आड़ी पट्टियाँ हैं, गहरा केसरिया रंग ऊपर, सफेद बीच में और गहरा हरा रंग सबसे नीचे है। ध्वज की लम्बाई-चौड़ाई का अनुपात 3:2 है। सफेद पट्टी के बीच में नीले रंग का एक चक्र है। इसका प्रारूप सारनाथ में अशोक सिंह स्तम्भ पर बने चक्र से लिया गया है। इसका व्यास लगभग सफेद पट्टी की चौड़ाई जितना है और इसमें चौबीस तीलियाँ हैं। भारत की संविधान सभा ने राष्ट्रीय-ध्वज का प्रारूप 22 जुलाई 1947 को अपनाया।
राष्ट्रीय पशु
भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ है। इसकी आठ प्रजातियों में से भारत में पाई जाने वाली प्रजाति को रायल बंगाल टाइगर के नाम से जाना जाता है। उत्तर पश्चिमी भारत को छोड़कर बाकी सारे देश में यह प्रजाति पाई जाती है। देश के बाघों की घटती संख्या जो 1972 में घटकर 1827 तक आ गयी थी, को थामने के लिए अप्रैल 1973 में बाघ परियोजना नाम से एक वृहद संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया गया। बाघ परियोजना के अन्तर्गत देश में अब तक 27 बाघ अभयारण्य स्थापित किए गए हैं जिनका क्षेत्रफल 33,875 वर्ग किलोमीटर है।
राष्ट्रीय पक्षी
भारत का राष्ट्रीय पक्षी मयूर है। हंस के आकार के इस रंग-बिरंगे पक्षी की गर्दन लंबी, आँख के नीचे एक सफेद निशान और सिर पर पंखे के आकार की कलगी लगी होती है। नर मयूर,मादा मयूर की अपेक्षा अधिक सुंदर होता है। मयूर भारतीय उप-महाद्वीप में सिंधु नदी के दक्षिण और पूर्व से लेकर, जम्मू और कश्मीर, असम के पूर्व मिजोरम के दक्षिण तक पूरे भारतीय प्रायद्वीप में व्यापक रूप से पाया जाता है। मयूर को लोगों का पूरा संरक्षण मिलता है। इसे धार्मिक या भावात्मक आधार पर कभी भी परेशान नहीं किया जाता है। भारतीय वन्य प्राणी (सुरक्षा) अधिनियम, 1972 के अंतर्गत इसे पूर्ण संरक्षण प्राप्त है।
राष्ट्रीय चिन्ह
भारत का राष्ट्रीय चिन्ह सारनाथ स्थित अशोक सिंह स्तम्भ की अनुकृति है जो सारनाथ के संग्रहालय में सुरक्षित है। मूल स्तम्भ में शीर्ष पर चार सिंह हैं जो एक-दूसरे की ओर पीठ किए हुए हैं। इनके नीचे घंटे के आकार के पद्म के ऊपर एक चित्रवल्लरी में एक हाथी, चौकड़ी भरता हुआ एक घोड़ा, एक साँड़ तथा एक सिंह की उभरी हुई मूर्तियाँ हैं जिनके बीच-बीच में चक्र बने हुए हैं। एक ही पत्थर को काटकर बनाए गए इस सिंह स्तम्भ के ऊपर 'धर्मचक्र' रखा था। भारत सरकार ने यह चिन्ह 26 जनवरी 1950 को अपनाया। इसमें केवल तीन सिंह दिखाई पड़ते हैं, चौथा दिखाई नहीं देता। पट्टी के मध्य में उभरी हुई नक्काशी में चक्र है, जिसके दाईं ओर एक साँड और बाईं ओर एक घोड़ा है। आधार का पद्म छोड़ दिया गया है। दाएं तथा बाएं छोरों पर अन्य चक्रों के किनारे हैं। फलक के नीचे मुंडकोपनिषद का सूत्र 'सत्यमेव जयते' देवनागरी लिपि में अंकित है, जिसका अर्थ है- 'सत्य की ही विजय होती है'।
राष्ट्रगान रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा रचित और संगीतबद्ध 'जन-गण-मन' को संविधान सभा ने भारत के राष्टï्रगान के रूप में 24 जनवरी 1950 को अपनाया था। यह सर्वप्रथम 27 दिसम्बर 1911 को भारतीय राष्टरीय काँग्रेसके कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था। पूरे गीत में पाँच पद हैं। प्रथम पद, राष्ट्रगान का पूरा पाठ है, जो इस प्रकार है :

जन-गण-मन अधिनायक,
जय हे भारत-भाग्य विधाता
पंजाब-सिंधु-गुजरात-मराठा-
द्राविड़ उत्कल बंग
विंध्य-हिमाचल-यमुना-गंगा
उच्छल-जलधि तरंग
तब शुभ नामे जागे,
तब शुभ आशिष माँगे,
गाहे तब जय-गाथा
जन-गण-मंगलदायक जय हे,
भारत-भाग्य विधाता
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे।
राष्ट्रगान के गायन की अवधि लगभग 52 सेकेण्ड है। कुछ अवसरों पर राष्ट्रगान को संक्षिप्त रूप से गाया जाता है जिसमें इसकी प्रथम और अंतिम पंक्तियाँ (गाने का समय लगभग 20 सेकेण्ड) होती हैं।
राष्ट्रगीत
बंकिमचंद्र चटर्जी का लिखा 'वन्दे मातरम्' गीत स्वतंत्रता संग्राम में जन-जन का प्रेरणा स्रोत था। यह गीत प्रथम बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में गाया गया था। इसका प्रथम पद इस प्रकार है :
वन्दे मातरम्
सुजलाम्, सुफलाम्,
मलयज-शीतलाम्,
शस्यश्यामलाम्, मातरम् !
शुभ्रज्योत्सना,
पुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्
सुखदाम्, वरदाम्, मातरम् !
राष्ट्रभाषा
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ गणराज्य भारत की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी तय की गई है। इसके अतिरिक्त संविधान द्वारा कुल 18 भाषाएँ शासकीय घोषित की गयी हैं।
भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी है। विश्व में हिन्दी तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा (45.7 करोड़ व्यक्ति) है।
राष्ट्रीय पंचाँग (कैलेण्डर) ग्रिगेरियन कैलेण्डर के साथ-साथ देशभर के लिए शक संवत् पर आधारित एकरूप राष्ट्रीय पंचाँग स्वीकार किया गया है, जिसका पहला महीना चैत्र है और सामान्य वर्ष 365 दिन का होता है। इसे 22 मार्च 1957 को अपनाया गया। राष्ट्रीय पंचांग का आधार हिन्दी महीने होते हैं, महीने के दिनों की गणना तिथियों के अनुसार होती है। इनमें घट-बढ़ होने के कारण ही देश में मनाये जाने वाले त्यौहार भी आगे-पीछे होते रहते हैं।
भारत के 50 सबसे बड़े शहर ( जनसंख्यानुसार )

भारत के 50 सबसे बड़े शहर ( जनसंख्यानुसार )

रैंकशहर जनसख्या (2001 जनगणना) जनसँख्या (2010 अनुमानित)
 1 मुंबई 11,978,450 13,830,884
 2 दिल्ली 9,879,172 12,565,901
 3 बंगलुरु 4,301,326 5,438,065
 4 कोलकाता 4,572,876 5,138,208
 5 चेन्नई 4,343,645 4,616,639
 6 हैदराबाद 3,637,483 4,068,611
 7 अहमदाबाद 3,520,085 3,959,432
 8 पुणे 2,538,473 3,446,330
 9 सूरत 2,433,835 3,344,135
 10 कानपुर 2551,337 3,221,435
 11 जयपुर 2,322,575 3,210,570
 12 लखनऊ 2,185,927 2,750,447
 13 नागपुर 2,052,066 2,447,063
 14 पटना 1,366,444 1,875,572
 15 इंदौर 1,474,968 1,854,930
 16 ठाणे 1,262,551 1,807,616
 17 भोपाल 1,437,354 1,792,203
 18 लुधियाना 1,398,467 1,740,247
 19 आगरा 1,275,134 1,686,976
 20 पिंपरी - चिंचवाड 1,012,472 1,637,905
 21 नासिक 1,077,236 1,585,444
 22 वडोदरा 1,306,227 1,539,428
 23 फरीदाबाद 1,055,938 1,521,605
 24 गाज़ियाबाद 968,256 1,505,958
 25 राजकोट 967,476 1,456,181
 26 मेरठ 1,068,772 1,404,723
 27 कल्याण- डाम्बिवाली 1,193,512 1,342,842
 28 नवी मुंबई 704,002 1,268,784
 29 अमृतसर 966,862 1,224,616
 30 वाराणसी 1,091,918 1,211,891
 31 औरंगाबाद 873,311 1,208,285
 32 शोलापुर 872,475 1,163,734
 33 इलाहाबाद 975,393 1,142,722
 34 जबलपुर 932,484 1,082,794
 35 श्रीनगर 898,440 1,081,562
 36 रांची 847,093 1,073,466
 37 विशाखापट्नम 982,904 1,065,395
 38

चंडीगढ़

808,515 1,064,711
 39 मैसूर 755,379 1,042,354
 40 हावड़ा 1,007,532 1,034,982
 41 जोधपुर 851,051 1,026,140
 42 गुवाहाटी 809,895 1,022,606
 43 कोयम्बटूर 930,882 1,016,348
 44 विजयवाडा 851,282 985,733
 45 मिरा-भयंदर 520,388 985,072
 46 ग्वालियर 827,026 943,725
 47 हुबली-धारवाड 786,195 904,916
 48 भुवनेश्वर 648,032 904,225
 49 जालंधर 706,043 903,491
 50 सलेम 696,760 895,388

 

लिंगानुपात

वर्ष लिंगानुपात
1941
945
1951 946
1961 941
1971 930
1981 934
1991 927
2001
933


  
जन्म व मृत्यु दर

 

वर्ष
जन्म दर मृत्यु दर
1941-51 39.9 27.4
1951-61 41.7 22.8
1961-71 41.2 19.2
1971-81 37.2 15.0
1981-91 30.5 10.2
1991-96 27.5 9.4
1996-2000 21.0 9.0
भारत की जनसँख्या

भारत की जनसँख्या

एक मार्च, 2001 को भारत की जनसंख्या एक अरब 2 करोड़ 80 लाख (532.1 करोड़ पुरुष और 496.4 करोड़ स्त्रियां) थी। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में भारत की आबादी करीब 23 करोड़ 84 लाख थी।

भारत की जनसंख्या की गणना 1901 के पश्चात हर दस साल बाद होती है। इसमें 1911-21 की अवधि को छोड़कर प्रत्येक दशक में आबादी में वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 1991-2001 की जनगणना अवधि में दौरान केरल में सबसे कम 9.43 और नगालैंड में सबसे अधिक 64.53 प्रतिशत जनसंख्या वृद्धि दर्ज की गई।

जनसंख्या घनत्व- जनसंख्या घनत्व को प्रति वर्ग किमी. क्षेत्र में लोगों की संख्या से परिभाषित कर सकते हैं। 2001 में देश में आबादी का घनत्व 324 प्रति वर्ग किमी. था। सन 1991 से 2001 के मध्य राज्यों और केद्रशासित प्रदेशों में जनसंख्या के घनत्व में वृद्धि हुई।

  •     सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला राज्य - पं. बंगाल (903 व्यक्ति प्रति किमी.)
  •     सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला केंद्रशासित प्रदेश- दिल्ली (6,319 व्यक्ति वर्ग किमी.)
  •     सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाला राज्य- अरुणाचल प्रदेश (10 व्यक्ति/वर्ग किमी.)
  •     सबसे कम जनसंख्या घनत्व वाला केंद्र शासित क्षेत्र-अंडमान और निकोबार केंद्र शासित राज्य- (34 व्यक्ति/वर्ग किमी.)

लिंगानुपात - लिंगानुपात को इस रूप में परिभाषित किया जाता है कि प्रति 1000 पुरुषों के अनुपात में स्त्रियों की संख्या कितनी है। इससे एक निश्चित समय में समाज में स्त्री-पुरुषों के बीच संख्यात्मक समानता का आंकलन किया जाता है। देश में लिंगानुपात हमेशा स्त्रियों के प्रतिकूल रहा है। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में यह अनुपात 972 था। 2001 में यह घटकर मात्र 933 ही रह गया।

भारत की अनुमानित जनसंख्या

भारत की जनांकिकीय में काफी ज्यादा विविधता है। भारत चीन के बाद दुनिया का सबसे जनसंख्या वाला देश है। अप्रैल 2010 में भारत की अनुमानित जनसंख्या 1.18 अरब थी। भारत की जनसंख्या कुल विश्व की जनसंख्या का छठवां भाग है। ऐसा अनुमान है कि 2025 तक भारत चीन को पछाड़ कर दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। इसकी जनसंख्या 2050 तक 1.6 अरब तक पहुँच जाएगी। लेकिन इतनी विशाल जनसंख्या होने के बावजूद भी भारत को एक बहुत बड़ा लाभ है। भारत की 50 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या 25 वर्ष से कम आयु की है जबकि 65 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। ऐसी आशा की जा रही है कि 2020 तक भारतीयों की औसत आयु 29 वर्ष होगी। इसकी तुलना में चीनियों की औसत आयु 37 वर्ष और जापानियों की औसत आयु 48 वर्ष होगी। भारत में दो हजार से भी अधिक जातीय समूह और दुनिया के चारों बड़े धर्म के अनुयायी यहां भारी संख्या में मौजूद हैं। दुनिया के चार बड़े भाषा परिवार- इंडो-यूरोपीय, द्रविड़, आस्ट्रो-एशियाटिक और तिब्बती-बर्मी भाषाओं के बोलने वाले भी यहां भारी संख्या में मौजूद हैं।
जहां तक भाषाई, आनुवंशिक और सांस्कृतिक विविधता का संबंध हैं केवल अफ्रीकी महद्वीप ही इस मामले में भारत से आगे है।

भारत की जनांकिकीय: महत्वपूर्ण तथ्य

जनसंख्या   
1,180,166,000 (2010 की अनुमानित)

वृद्धि दर   
1.548 फीसदी

जन्म दर   
22.22 जन्म प्रति 1000 जनसंख्या (2009 अनुमानित)

मृत्यु दर   
6.4 मृत्यु प्रति 1000 जनसंख्या (2009 अनुमानित)

आयु प्रत्याशा   
69.89 वर्ष (2009 अनुमानित)

  •     पुरुष    67.46 वर्ष (2009 अनुमानित)
  •     महिला    72.61 वर्ष (2009 अनुमानित)

आयु संरचना

  •     0-14 वर्ष    31.1 प्रतिशत
            (प्रति पुरुष 1,90,075,426
            महिला 1,72,799,553) (2009 अनुमानित)
  •     15-64 वर्ष    63.6 प्रतिशत
            (प्रति 381,446,079 पुरुष
            महिला 359,802,209) (2009 अनुमानित)
  •     65 या अधिक     5.3 प्रतिशत
            (प्रति पुरुष 29,364,920
            महिला 32,591,030) (2009 अनुमानित)

लिंगानुपात

  •     जन्म के समय    1.12 पुरुष प्रति एक महिला (2009)
  •     15 वर्ष से कम    1.10 पुरुष प्रति एक महिला (2009)
  •     15-64 वर्ष    1.06 पुरुष प्रति एक महिला (2009)
  •     65 वर्ष से ऊपर    0.90 पुरुष प्रति एक महिला (2009)