भारत का भूगोल

 

देश में वर्षा का वितरण

अधिक वर्षा वाले क्षेत्र- यहाँ वार्षिक वर्षा की मात्रा 200 सेमी. से अधिक होता है। क्षेत्र- असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, सिक्किम, कोंकण, मालाबार तट, दक्षिण कनारा, मणिपुर एवं मेघालय।

साधारण वर्षा वाले क्षेत्र- इस क्षेत्र में वार्षिक वर्षा की मात्रा 100 से 200 सेमी. तक होती है। क्षेत्र- पश्चिमी घाट का पूर्वोत्तर ढाल,  पं. बँगाल का दक्षिणी- पश्चिमी क्षेत्र, उड़ीसा, बिहार, दक्षिणी-पूर्वी उत्तर प्रदेश इत्यादि।

न्यून वर्षा वाले क्षेत्र- यहाँ 50 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा होती है। क्षेत्र- मध्य प्रदेश, दक्षिण का पठारी भाग, गुजरात, कर्नाटक, पूर्वी राजस्थान, दक्षिणी पँजाब, हरियाणा तथा दक्षिणी उत्तर प्रदेश।

अपर्याप्त वर्षा वाले क्षेत्र- यहाँ वर्षा 50 सेमी. से भी कम होती है। क्षेत्र- कच्छ, पश्चिमी राजस्थान, लद्दाख आदि।

भूगर्भिक इतिहास
भारत की भूगर्भीय संरचना को कल्पों के आधार पर विभाजित किया गया है। प्रीकैम्ब्रियन कल्प के दौरान बनी कुडप्पा और विंध्य प्रणालियां पूर्वी व दक्षिणी राज्यों में फैली हुई हैं। इस कल्प के एक छोटे काल के दौरान पश्चिमी और मध्य भारत की भी भूगर्भिक संरचना तय हुई। पेलियोजोइक कल्प के कैम्ब्रियन, ऑर्डोविसियन, सिलुरियन और डेवोनियन शकों के दौरान पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में कश्मीर और हिमाचल प्रदेश का निर्माण हुआ। मेसोजोइक दक्कन ट्रैप की संरचनाओं को उत्तरी दक्कन के अधिकांश हिस्से में देखा जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि इस क्षेत्र का निर्माण ज्वालामुखीय विस्फोटों की वजह से हुआ। कार्बोनिफेरस प्रणाली, पर्मियन प्रणाली और ट्रियाजिक प्रणाली को पश्चिमी हिमालय में देखा जा सकता है। जुरासिक शक के दौरान हुए निर्माण को पश्चिमी हिमालय और राजस्थान में देखा जा सकता है।
टर्शियरी युग के दौरान मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और हिमालियन पट्टिका में काफी नई संरचनाएं बनी। क्रेटेशियस प्रणाली को हम मध्य भारत की विंध्य पर्वत श्रृंखला व गंगा दोआब में देख सकते हैं। गोंडवाना प्रणाली को हम नर्मदा नदी के विंध्य व सतपुरा क्षेत्रों में देख सकते हैं। इयोसीन प्रणाली को हम पश्चिमी हिमालय और असम में देख सकते हैं। ओलिगोसीन संरचनाओं को हम कच्छ और असम में देख सकते हैं। इस कल्प के दौरान प्लीस्टोसीन प्रणाली का निर्माण ज्वालमुखियों के द्वारा हुआ। हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण इंडो-ऑस्ट्रेलियन और यूरेशियाई प्लेटों के प्रसार व संकुचन से हुआ है। इन प्लेटों में लगातार प्रसार की वजह से हिमालय की ऊँचाई प्रतिवर्ष 1 सेमी. बढ़ रही है।

भारतीय प्लेट: भारत पूरी तरह से भारतीय प्लेट पर स्थित है। यह एक प्रमुख टेक्टोनिक प्लेट है जिसका निर्माण प्राचीन महाद्वीप गोंडवानालैंड के टूटने से हुआ है। लगभग 9 करोड़ वर्ष पूर्व उत्तर क्रेटेशियस शक के दौरान भारतीय प्लेट ने उत्तर की ओर लगभग 15 सेमी प्रति वर्ष की दर से गति करना आरंभ कर दिया। सेनोजोइक कल्प के इयोसीन शक के दौरान लगभग 5 से 5.5 करोड़ वर्ष पूर्व यह प्लेट एशिया से टकराई। 2007 में जर्मन भूगर्भशास्त्रियों ने बताया कि भारतीय प्लेट के इतने तेजी से गति करने का सबसे प्रमुख कारण इसका अन्य प्लेटों की अपेक्षा काफी पतला होना था। हाल के वर्र्षों में भारतीय प्लेट की गति लगभग 5 सेमी. प्रतिवर्ष है। इसकी तुलना में यूरेशियाई प्लेट की गति मात्र 2 सेमी प्रतिवर्ष ही है। इसी वजह से भारत को च्फास्टेस्ट कांटीनेंटज् की संज्ञा दी गई है।

 

जल राशि
भारत में लगभग 14,500 किमी. आंतरिक नौपरिवहन योग्य जलमार्ग हैं। देश में कुल 12 नदियां ऐसी हैं जिन्हें बड़ी नदियों की श्रेणी में रखा जा सकता है। इन नदियों का कुल अपवाह क्षेत्रफल 2,528,000 वर्ग किमी. है। भारत की सभी प्रमुख नदियां निम्नलिखित तीन क्षेत्रों से निकलती हैं-
1. हिमालय या काराकोरम श्रृंखला
2. मध्य भारत की विंध्य और सतपुरा श्रृंखला
3. पश्चिमी भारत में साह्यïद्री अथवा पश्चिमी घाट
हिमालय से निकलने वाली नदियों को यहां के ग्लेशियरों से जल प्राप्त होता है। इनकी खास बात यह है कि पूरे वर्ष इन नदियों में जल रहता है। अन्य दो नदी प्रणालियां पूरी तरह से मानसून पर ही निर्भर हैं और गर्मी के दौरान छोटी नदियां मात्र बन कर रह जाती हैं। हिमालय से पाकिस्तान बह कर जाने वाली नदियों में सिंधु, ब्यास, चिनाब, राबी, सतलुज और झेलम शामिल हैं।
गंगा-ब्रह्म्ïापुत्र प्रणाली का जल अपवाह क्षेत्र सबसे ज्यादा 1,100,000 वर्ग किमी. है। गंगा का उद्गम स्थल उत्तरांचल के गंगोत्री ग्लेशियर से है। यह दक्षिण-पूर्व दिशा में बहते हुए बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती है। ब्रह्म्ïापुत्र नदी का उद्गम स्थल तिब्बत में है और अरुणाचल प्रदेश में यह भारत में प्रवेश करती है। यह पश्चिम की ओर बढ़ते हुए बांग्लादेश में गंगा से मिल जाती है।
पश्चिमी घाट दक्कन की सभी नदियों का स्रोत है। इसमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियां शामिल हैं। ये सभी नदियां बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। भारत की कुल 20 फीसदी जल अपवाह इन नदियों के द्वारा ही होता है।
भारत की मुख्य खाडिय़ों में कांबे की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी और मन्नार की खाड़ी शामिल हैं। जल संधियों में पाल्क जलसंधि है जो भारत और श्रीलंका को अलग करती है, टेन डिग्री चैनल अंडमान को निकोबार द्वीपसमूह से अलग करता है और ऐट डिग्री चैनल लक्षद्वीप और अमिनदीवी द्वीपसमूह को मिनीकॉय द्वीप से अलग करता है। महत्वपूर्ण अंतरीपों में भारत की मुख्यभूमि के धुर दक्षिण भाग में स्थित कन्याकुमारी, इंदिरा प्वाइंट (भारत का धुर दक्षिण हिस्सा), रामा ब्रिज और प्वाइंट कालीमेरे शामिल हैं। अरब सागर भारत के पश्चिमी किनारे पर पड़ता है, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर भारत के क्रमश: पूर्वी और दक्षिणी भाग में स्थित हैं। छोटे सागरों में लक्षद्वीप सागर और निकोबार सागर शामिल हैं। भारत में चार प्रवाल भित्ति क्षेत्र हैं। ये चार क्षेत्र अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, मन्नार की खाड़ी, लक्षद्वीप और कच्छ की खाड़ी में स्थित हैं। महत्वपूर्ण झीलों में चिल्क झील (उड़ीसा में स्थित भारत की सबसे बड़ी साल्टवाटर झील), आंध्र प्रदेश की कोल्लेरू झील, मणिपुर की लोकतक झील, कश्मीर की डल झील, राजस्थान की सांभर झील और केरल की सस्थामकोट्टा झील शामिल हैं।

 

प्राकृतिक संसाधन
भारत के कुल अनुमानित पुनर्नवीनीकृत जल संसाधन 1,907.8 किमी.घन प्रति वर्ष हैं। भारत में प्रतिवर्ष 350 अरब घन मी. प्रयोग योग्य भूमि जल की उपलब्धता है। कुल 35 फीसदी भूमिजल संसाधनों का ही उपयोग किया जा रहा है। देश की प्रमुख नदियों व जल मार्र्गों से प्रतिवर्ष 4.4 करोड़ टन माल ढोया जाता है। भारत की 56 फीसदी भूमि खेती योग्य है और कृषि के लिए प्रयोग की जाती है।
एक मोटे अनुमान के अनुसार भारत में 5.4 अरब बैरल कच्चे तेल के भंडार हैं। इनमें से अधिकांश बांबे हाई, अपर असम, कांबे, कृष्णा-गोदावरी और कावेरी बेसिन में स्थित हैं। आंध्र प्रदेश, गुजरात और उड़ीसा में लगभग 17 खरब घन फीट प्राकृतिक गैस के भंडार हैं। आंध्र प्रदेश में यूरेनियम के भंडार हैं।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा माइका उत्पादक देश है। बैराइट व क्रोमाइट उत्पादन के मामले में भारत का दूसरा स्थान है। कोयले के उत्पादन के मामले में भारत का दुनिया में तीसरा स्थान है, वहीं लौह अयस्क के उत्पादन के मामले में भारत का चौथा स्थान है। यह बॉक्साइट और कच्चे स्टील के उत्पादन के मामले में छठवें स्थान पर है और मैंगनीज अयस्क उत्पादन के मामले में सातवें स्थान पर है। अल्म्युनियम उत्पादन के मामले में इसका आठवां स्थान है। भारत में टाइटेनियम, हीरे और लाइमस्टोन के भी भंडार प्रचुर मात्रा में हैं। भारत में दुनिया के 24 फीसदी थोरियम भंडार मौजूद हैं।

 

नमभूमि
नमभूमि वह क्षेत्र है जो शुष्क और जलीय इलाके से लेकर कटिबंधीय मानसूनी इलाके में फैली होती है और यह वह क्षेत्र होता है जहां उथले पानी की सतह से भूमि ढकी रहती है। ये क्षेत्र बाढ़ नियंत्रण में प्रभावी हैं और तलछट कम करते हैं। भारत में ये कश्मीर से लेकर प्रायद्वीपीय भारत तक फैले हैं। अधिकांश नमभूमि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर नदियों के संजाल से जुड़ी हुई हैं। भारत सरकार ने देश में संरक्षण के लिए कुल 71 नमभूमियों का चुनाव किया है। ये राष्ट्रीय पार्र्कों व विहारों के हिस्से हैं। कच्छ वन समूचे भारतीय समुद्री तट पर परिरक्षित मुहानों, ज्वारीय खाडिय़ों, पश्च जल क्षार दलदलों और दलदली मैदानों में पाई जाती हैं। देश में कच्छ क्षेत्रों का कुल क्षेत्रफल 4461 वर्ग किमी. है जो विश्व के कुल का 7 फीसदी है। भारत में  मुख्य रूप से कच्छ वन अंडमान व निकोबार द्वीपसमूह, सुंदरबन डेल्टा, कच्छ की खाड़ी और महानदी, गोदावरी और कृष्णा नदियों के डेल्टा पर स्थित हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल के कुछ क्षेत्रों में भी कच्छ वन स्थित हैं।
सुंदरबन डेल्टा दुनिया का सबसे बड़ा कच्छ वन है। यह गंगा के मुहाने पर स्थित है और पं. बंगाल और बांग्लादेश में फैला हुआ है। यहां के रॉयल बंगाल टाइगर प्रसिद्ध हैं। इसके अतिरिक्त यहां विशिष्ट प्राणि जात पाये जाते हैं।

 

भारत की प्रमुख जनजातियां
भारत में जनजातीय समुदाय के लोगों की काफी बड़ी संख्या है और देश में 50 से भी अधिक प्रमुख जनजातीय समुदाय हैं। देश में रहने वाले जनजातीय समुदाय के लोग नेग्रीटो, ऑस्ट्रेलॉयड और मंगोलॉयड प्रजातियों से सम्बद्ध हैं। देश की प्रमुख जनजातियां निम्नलिखित हैं-

आंध्र प्रदेश: चेन्चू, कोचा, गुड़ावा, जटापा, कोंडा डोरस, कोंडा कपूर, कोंडा रेड्डी, खोंड, सुगेलिस, लम्बाडिस, येलडिस, येरुकुलास, भील, गोंड, कोलम, प्रधान, बाल्मिक।
असम व नगालैंड: बोडो, डिमसा गारो, खासी, कुकी, मिजो, मिकिर, नगा, अबोर, डाफला, मिशमिस, अपतनिस, सिंधो, अंगामी।

झारखण्ड: संथाल, असुर, बैगा, बन्जारा, बिरहोर, गोंड, हो, खरिया, खोंड, मुंडा, कोरवा, भूमिज, मल पहाडिय़ा, सोरिया पहाडिय़ा, बिझिया, चेरू लोहरा, उरांव, खरवार, कोल, भील।

महाराष्ट्र: भील, गोंड, अगरिया, असुरा, भारिया, कोया, वर्ली, कोली, डुका बैगा, गडावास, कामर, खडिया, खोंडा,  कोल, कोलम, कोर्कू, कोरबा, मुंडा, उरांव, प्रधान, बघरी।

पश्चिम बंगाल: होस, कोरा, मुंडा, उरांव, भूमिज, संथाल, गेरो, लेप्चा, असुर, बैगा, बंजारा, भील, गोंड, बिरहोर, खोंड, कोरबा, लोहरा।

हिमाचल प्रदेश: गद्दी, गुर्जर, लाहौल, लांबा, पंगवाला, किन्नौरी, बकरायल।

मणिपुर: कुकी, अंगामी, मिजो, पुरुम, सीमा।

मेघालय: खासी, जयन्तिया, गारो।

त्रिपुरा: लुशाई, माग, हलम, खशिया, भूटिया, मुंडा, संथाल, भील, जमनिया, रियांग, उचाई।

कश्मीर: गुर्जर।

गुजरात: कथोड़ी, सिद्दीस, कोलघा, कोटवलिया, पाधर, टोडिय़ा, बदाली, पटेलिया।

उत्तर प्रदेश: बुक्सा, थारू, माहगीर, शोर्का, खरवार, थारू, राजी, जॉनसारी।

उत्तरांचल: भोटिया, जौनसारी, राजी।

केरल: कडार, इरुला, मुथुवन, कनिक्कर, मलनकुरावन, मलरारायन, मलावेतन, मलायन, मन्नान, उल्लातन, यूराली, विशावन, अर्नादन, कहुर्नाकन, कोरागा, कोटा, कुरियियान,कुरुमान, पनियां, पुलायन, मल्लार, कुरुम्बा।

छत्तीसगढ़: कोरकू, भील, बैगा, गोंड, अगरिया, भारिया, कोरबा, कोल, उरांव, प्रधान, नगेशिया, हल्वा, भतरा, माडिया, सहरिया, कमार, कंवर।

तमिलनाडु: टोडा, कडार, इकला, कोटा, अडयान, अरनदान, कुट्टनायक, कोराग, कुरिचियान, मासेर, कुरुम्बा, कुरुमान, मुथुवान, पनियां, थुलया, मलयाली, इरावल्लन, कनिक्कर,मन्नान, उरासिल, विशावन, ईरुला।

कर्नाटक: गौडालू, हक्की, पिक्की, इरुगा, जेनु, कुरुव, मलाईकुड, भील, गोंड, टोडा, वर्ली, चेन्चू, कोया, अनार्दन, येरवा, होलेया, कोरमा।

उड़ीसा: बैगा, बंजारा, बड़होर, चेंचू, गड़ाबा, गोंड, होस, जटायु, जुआंग, खरिया, कोल, खोंड, कोया, उरांव, संथाल, सओरा, मुन्डुप्पतू।

पंजाब: गद्दी, स्वागंला, भोट।

राजस्थान:मीणा, भील, गरसिया, सहरिया, सांसी, दमोर, मेव, रावत, मेरात, कोली।

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह: औंगी आरबा, उत्तरी सेन्टीनली, अंडमानी, निकोबारी, शोपन।

अरुणाचल प्रदेश: अबोर, अक्का, अपटामिस, बर्मास, डफला, गालोंग, गोम्बा, काम्पती, खोभा मिसमी, सिगंपो, सिरडुकपेन।


प्राकृतिक संसाधन और भूमि प्रयोग

पृथ्वी हमें प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराती है जिसे मानव अपने उपयोगी कार्र्यों के लिए प्रयोग करता है। इनमें से कुछ संसाधन को पुनर्नवीनीकृत नहीं किया जा सकता है, उदाहरणस्वरूप- खनिज ईंधन जिनका प्रकृति द्वारा जल्दी से निर्माण करना संभव नहीं है।पृथ्वी की भूपर्पटी से जीवाश्मीय ईंधन के भारी भंडार प्राप्त होते हैं। इनमें कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और मीथेन क्लेथरेट शामिल हैं। इन भंडारों का उपयोग ऊर्जा व रसायन उत्पादन के लिए किया जाता है। खनिज अयस्क पिंडों का निर्माण भी पृथ्वी की भूपर्पटी में ही होता है।
पृथ्वी का बायोमंडल मानव के लिए उपयोगी कई जैविक उत्पादों का उत्पादन करता है। इनमें भोजन, लकड़ी, फार्मास्युटिकल्स, ऑक्सीजन इत्यादि शामिल हैं। भूमि आधारित पारिस्थिकीय प्रणाली मुख्य रूप से मृदा की ऊपरी परत और ताजा जल पर निर्भर करती है। दूसरी ओर महासागरीय पारिस्थितकीय प्रणाली भूमि से महासागरों में बहकर गये हुए पोषणीय तत्वों पर निर्भर करती है।


विश्व में भूमि प्रयोग
  

खेती योग्य भूमि
13.13 प्रतिशत
स्थाई फसलें 4.71 प्रतिशत
स्थाई चारागाह 26 प्रतिशत
वन 32 प्रतिशत
शहरी क्षेत्र 
1.5 प्रतिशत
अन्य 
30 प्रतिशत

 


तापमान 
तापमान ऊष्मा की तीव्रता अर्थात वस्तु की तप्तता की मात्रा का ज्ञान कराता है। ग्लोब को तीन तापमान क्षेत्रों में विभाजित किया गया है-

उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (Tropical zone)- यह कर्क रेखा व मकर रेखा के मध्य स्थित होता है। वर्षपर्यंत उच्च तापमान रहता है।

समशीतोष्ण क्षेत्र (Temperate zone)- यह दोनों गोलाद्र्धों में 23श 30Ó और 66श ३०ज् अक्षांशों के मध्य स्थित है।

शीत कटिबंध क्षेत्र (Frigid Zone) - दोनों गोलाद्र्धों में यह ध्रुवों और 66श ३०ज् अक्षांश के मध्य स्थित है। वर्षपर्यंत यहाँ निम्न तापमान रहता है।
पृथ्वी का औसत तापमान सदैव समान रहता है।

 

वायुदाब

वायुदाब को प्रति इकाई क्षेत्रफल पर पडऩे वाले बल के रूप में मापते हैं। इसका स्पष्टï तात्पर्य है कि किसी दिए गए स्थान तथा समय पर वहाँ की हवा के स्तम्भ का सम्पूर्ण भार। इसकी इकाई 'मिलीबार' कहलाती है। वायुदाब के क्षैतिज वितरण को देखने पर धरातल पर वायुदाब की 4 स्पष्ट पेटियाँ पाई जाती हैं।
भूमध्यरेखीय निम्न वायुदाब की पेटी (Equational Low Pressure Belt) - धरातल पर भूमध्यरेखा के दोनों ओर ५श अक्षांशों के बीच निम्न वायुदाब की पेटी का विस्तार पाया जाता है। शांत वातावरण के कारण इस पेटी को शांत पेटी या डोलड्रम भी कहते हैं।
उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब की पेटियाँ (The subtropical high pressure)- भूमध्य रेखा से ३०श-३५श अक्षांशों  पर दोनों गोलाद्र्धों में उच्च वायुदाब की पेटियों  की उपस्थित पाई जाती है। उच्च वायुदाब वाली इस पेटी को 'अश्व अक्षांश' (horse latitude) कहते हैं।
उपध्रुवीय निम्न वायुदाब की पेटियाँ (Sub-Polar low pressure belt)- दोनों गोलाद्र्धों में ६०श से ६५श अक्षांशों के बीच निम्न वायुदाब की पेटियाँ पाई जाती हैं।
ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटियाँ (Polar high)- यह पेटियाँ ध्रुवों पर पाई जाती हैं। इन क्षेत्रों में न्यूनतम तापमान के कारण ध्रुवीय उच्च वायुदाब की पेटियों का निर्माण होता है।

 

पवन

क्षैतिज रूप में गतिशील होने वाली हवा को ही पवन कहते है। वायुदाब की विषमताओं को संतुलित करने की दिशा में यह प्रकृति का एक स्वभाविक प्रयास है। धरातल पर निम्न प्रकार की पवन पाई जाती हैं-
प्रचलित पवन (Prevailing Wind) - जो पवन वायुदाब के अक्षांशीय अंतर के कारण वर्ष भर एक से दूसरे कटिबंध की ओर प्रवाहित होती रहती हैं, उसे प्रचलित पवन कहते हैं।  व्यापारिक पवन (trade Winds), पछुआ पवन (westerlies) व ध्रुवीय पवन (Polar winds) इत्यादि प्रचलित पवन के उदाहरण हैं|

सामयिक पवन (periodic winds)- मौसम या समय के साथ जिन पवनों की दिशा में परिवर्तन पाया जाता है, उन्हें सामयिक या कालिक पवन कहा जाता है। पवनों के इस वर्ग में मानसून पवनें, स्थल तथा सागर समीर शामिल हैं।

स्थानीय पवन (Local Winds) - स्थानीय पवनों की उत्पत्ति तापमान तथा दाब के स्थानीय अंतर की वजह से होता है। लू स्थानीय पवन का एक बेहतर उदाहरण है।
आद्र्रता वायुमण्डल में विद्यमान अदृश्य जलवाष्प की मात्रा ही आद्र्रता (Humidity) कहलाती है।

निरपेक्ष आद्र्रता (Absolute humidity) - वायु के प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा को निरपेक्ष आद्र्रता कहते हैं.

विशिष्टï आद्र्रता (Specific Humidity) - हवा के  प्रति इकाई भार में जलवायु के भार का अनुपात विशिष्टï आद्र्रता कहलाती है।

सापेक्ष आद्र्रता (Relative Humidity) - एक निश्चित तापमान पर निश्चित आयतन वाली वायु की आद्र्रता सामथ्र्य तथा उसमें विद्यमान वास्तविक आद्र्रता के अनुपात को सापेक्ष आद्र्रता कहते हैं।

बादल

वायुमण्डल में काफी ऊँचाई में जलवाष्प के संघनन से बने जलकणों या हिमकणों की विशाल राशि को बादल कहते हैं। मुख्यत: बादल हवा के रूद्धोष्म (Adiabatic) प्रक्रिया द्वारा ठण्डे होने तथा उसके तापमान के ओसांक बिन्दु तक गिरने के परिणामस्वरूप निर्मित होते हैं। ऊँचाई के अनुसार बादल निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

ऊँचे मेघ - धरातल से 6,000 से 12,000 मी.।

मध्यम मेघ - धरातल से 2,000 से 6,000 मी.

निचले मेघ - धरातल से 2,000 मी. तक।

 

मानव भूगोल

जनसंख्या का तात्पर्य किसी क्षेत्र अथवा सम्पूर्ण विश्व में निवास करने वाले लोगों की संपूर्ण संख्या से होता है। पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल का मात्र आठवां हिस्सा ही मानव के रहने योग्य है। संपूर्ण पृथ्वी के तीन-चौथाई हिस्से में महासागर स्थित हैं जबकि थलमंडल का के 14 फीसदी हिस्से में मरुस्थल और 27 फीसदी हिस्से में पर्वत स्थित हैं। इसके अतिरिक्त काफी ऐसा क्षेत्र है जो मानव के निवास योग्य नहीं है। पृथ्वी के सुदूर उत्तरी क्षेत्र में अंतिम मानव बस्ती एलर्ट है जो नुनावुत, कनाडा के इल्लेसमेरे द्वीप पर स्थित है। दूसरी ओर सुदूर दक्षिण में अंटार्कटिका पर अमुंडसेन-स्कॉट पोल स्टेशन है। 1650 के बाद के लगभग 300 वर्र्षों में विश्व जनसंख्या में इतनी तीव्र गति से वृद्धि हुई है जितनी किसी पूववर्ती काल में अनुमानित नहीं थी। दिसंबर 2009 के आंकड़ों के अनुसार विश्व की जनसंख्या 6,803,000,000 थी। एक मोटे अनुमान के अनुसार 2013 और 2050 में विश्व की जनसंख्या क्रमश: 7 अरब और 9.2 अरब हो जाएगी। जनसंख्या वृद्धि मुख्य रूप से विकासशील देश में ही होगी। जनसंख्या घनत्व के लिहाज से भी विश्व जनसंख्या में काफी विविधता है। दुनिया की बहुसंख्यक जनसंख्या एशिया में निवास करती है। एक अनुमान के अनुसार 2020 तक दुनिया की 60 फीसदी जनसंख्या शहरी क्षेत्रों में निवास कर रही होगी।

 


प्रमुख फसलें व उनके उत्पादक देश
चावल- चीन, जापान, थाईलैंड, इंडोनेशिया, म्यांमार, भारत, बांग्लादेश, ब्राजील, वियतनाम।
गेहूँ- सं. रा. अमेरिका, कनाडा, अर्जेन्टीना, फ्रांस, इटली, भारत, चीन, तुर्की।
मक्का- सं. रा. अमेरिका, मैक्सिको, ब्राजील, अर्जेन्टीना, रोमानिया, दक्षिणी अफ्रीका, भारत, चीन।
ज्वार-बाजरा- सं. रा. अमेरिका, भारत, चीन, जापान, सूडान, अर्जेन्टीना।
चाय- चीन, भारत, जापान, श्रीलंका, इंडोनेशिया।
कॉफी- ब्राजील, कोलम्बिया, मध्य अमेरिका, अंगोला, यूगांडा, जायरे।
गन्ना- क्यूबा, भारत, पाकिस्तान, चीन, ऑस्ट्रेलिया, मिस्र, मैक्सिको।
कपास- सं. रा. अमेरिका, चीन, भारत, मिस्र, पाकिस्तान, ब्राजील।
पटसन- बांग्लादेश, भारत, ब्राजील, थाईलैंड, मिस्र, ताइवान, मलेशिया।
तम्बाकू- सं. रा. अमेरिका, चीन, क्यूबा, ब्राजील, बुल्गारिया, रूस, जापान, फिलीपीन्स।
रबड़- इंडोनेशिया, मलेशिया, थाइलैंड, श्रीलंका, भारत, कंबोडिया, वियतनाम, नाइजीरिया।

जलमंडल

पूरे सौरमंडल में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है जिस पर भारी मात्रा में जल उपस्थित है। यह एक ऐसा तथ्य है जो पृथ्वी को अन्य ग्रहों से विशिष्ट बनाता है। पृथ्वी के धरातल के लगभग 70 फीसदी भाग को घेरे हुई जल राशियों को जलमंडल कहा जाता है। जल मंडल में मुख्य रूप से महासागर शामिल हैं लेकिन तकनीकी रूप से इसमें पृथ्वी की संपूर्ण जलराशि शामिल है जिसमें आंतरिक समुद्र, झील, नदियां और 2 किमी. की गहराई तक पाया जाने वाला भूमिजल शामिल हैं। महासागरों की औसत गहराई 4 किमी. है। विश्व के महासागरों का कुल आयतन लगभग 1.4 बिलियन घन किमी. है। पृथ्वी पर उपस्थित कुल जल राशि का 97.5 फीसदी महासागरों के अंतर्गत आता है। जबकि बाकी 2.5 फीसदी ताजे जल के रूप में है। ताजे जल में भी लगभग 68.7 फीसदी जल बर्फ के रूप में है।समुद्री जल में औसत लवणता लगभग 34.5 प्रति हजार होती है अर्थात 1 किग्रा. जल में 34.5 ग्राम लवण उपस्थित होता है। महासागर घुली हुई वातावरणीय गैसौं के भी बहुत बड़े भंडार होते हैं। यह गैसें समुद्री जीवों के जीवन के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। समुद्री जल का विश्व के मौसम पर बहुत ही महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। महासागर विशाल ऊष्मा भंडार के रूप में कार्य करते हैं। महासागरीय तापमान वितरण में परिवर्तन से जलवायु पर बहुत बड़ा असर पड़ता है। उदाहरणस्वरूप, अल-नीनो।

चुम्बकीय क्षेत्र

पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र एक चुम्बकीय द्विध्रुव के आकार का है और वर्तमान में यह लगभग ग्रह के भौगोलिक धु्रवों पर ही स्थित है। डायनमो सिद्धांत के अनुसार, चुम्बकीय क्षेत्र का उद्भव पिघले हुए बाहरी क्रोड के अंदर ही होता है, जहां ऊष्मा संवहन धाराएं पैदा करती है  जिससे विद्युत धारा पैदा होती है। इसी से पृथ्वी का चुम्बकीय क्षेत्र पैदा होता है। करोड़ों साल के अंतर में इस चुम्बकीय क्षेत्र में दिशा परिवर्तन होता है। चुम्बकीय क्षेत्र की वजह से चुम्बकीय मंडल पैदा होता है जो सौर तूफान के उत्पन्न होने पर कॉस्मिक किरणों को पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश नहीं करने देता है। इसी वजह से चुम्बकीय क्षेत्र व सौर पवन मिलकर वान एलेन पट्टिका का निर्माण करते हैं। जब सौर पवन के कण जिन्हें प्लाज्मा भी कहते हैं, चुम्बकीय ध्रुवों में पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करते हैं तो इससे ध्रुवीय ज्योति का निर्माण होता है।


जैवमंडल

पृथ्वी के समस्त जीव मिलकर जैवमंडल का निर्माण करते हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि बायोमंडल का विकास लगभग 3.5 अरब वर्ष पूर्व शुरू हुआ था। बायोमंडल को कई बायोम में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक बायोम में एक प्रकार के पेड़-पौधे व जीव पाये जाते हैं। स्थल पर बायोम का विभाजन अक्षांश, समुद्र स्तर से ऊँचाई और आद्र्रता के आधार पर किया जाता है। आर्कटिक व अंटार्कटिक वृत्तों के बीच में और अत्यंत बंजर भूमि पर  पडऩे वाले भौमिक बायोमों में पेड़-पौधों व जीवों की संख्या काफी कम होती है। विषुवतीय अक्षांशों की आद्र्र निचली भूमियों में प्रजातियों की विभिन्नता सबसे ज्यादा पाई जाती है।


वायुमंडल

 

पृथ्वी को चारों ओर सैकड़ों किमी. की मोटाई में लपेटने वाले गैसीय आवरण को वायुमंडल कहते हैं। वायुमंडल गर्मी को रोककर रखने में एक विशाल 'काँच घरÓ का काम करता है,जोलघु तरंगों और विकिरण को पृथ्वी के धरातल पर आने देता है, परंतु पृथ्वी से विकरित होने वाली तरंगों को बाहर जाने से रोकता है। इस प्रकार वायुमंडल पृथ्वी पर सम तापमान बनाए रखता है।

वायुमण्डल की वायु के मुख्य अवयव नाइट्रोजन (78'), ऑक्सीजन (21'), ऑर्गन (0.93') और कार्बन-डाई-ऑक्साइड (0.003') हैं। वायुमण्डल में जलवाष्प एवं गैसों के अतिरिक्त सूक्ष्म ठोस कणों की उपस्थित भी ज्ञात की गई है। वायुमण्डल को निम्न 5 मण्डलों में विभाजित किया जाता है-

 

क्षोभमण्डल (troposphere)- यह वायुमंडल का सबसे निचला हिस्सा है। इसकी ऊँचाई धरातल से 12 किमी. तक है। इस मण्डल में जलवाष्प एवं धूल कणों की अत्याधिकमात्रा के विद्यमान रहने के कारण वायुमण्डल के गर्म एवं शीतल होने की विकिरण, संचालन तथा संवाहन की क्रियाएँ सम्पन्न होती हैं।

 

समताप मण्डल (Stratosphere) क्षोभ सीमा के ऊपर औसत 50 किमी. की ऊँचाई पर समतापमण्डल का विस्तार पाया जाता है। इस मण्डल में 20 से 35 किमी. के बीच ओजोन परत की सघनता काफी अधिक है, इसलिए इस क्षेत्र को ओजोन मंडल भी कहा जाता है।

मध्य मण्डल (Mesophere) - समताप मण्डल के ऊपर सामान्यत: 50 से 80 किमी. की ऊँचाई वाला वायुमण्डलीय भाग मध्य मण्डल के नाम से जाना जाता है। इस मण्डल में ऊँचाईके साथ तापमान का ह्रस होता है। यहाँ तापमान -100शष्ट हो जाता है।

 

तापमण्डल (Thermosphere) - धरातल से 80 किमी. की ऊँचाई से  लेकर 640 किमी. तक तापमण्डल का विस्तार है। इस मण्डल में ऊँचाई के साथ तापमान में वृद्धि होती है और इसकी सबसे ऊपरी सीमा पर 1700शष्ट तापमान अनुमानित है।

बाह्यमण्डल (Exosphere)- वायुमंडल में पृथ्वी के धरातल से 640 किमी. के ऊपर बाह्यïमण्डल का विस्तार मिलता है। इसे वायुमण्डल का सीमांत क्षेत्र कहा जाता है। इस मण्डल की वायु अत्यंत विरल होती है।

वायुमंडल का संघटन
घटक आयतन के अनुसार प्रतिशत
नाइट्रोजन 78.08
ऑक्सीजन 20.9
ऑर्गन 0.93
कार्बन डाईऑक्साइड 0.03
नियॉन 0.0018
हीलियम 0.0005
ओजोन 0.00006
हाइड्रोजन 0.00005
मीथेन अल्प मात्रा
क्रिप्टॉन अल्प मात्रा
जीनॉन अल्प मात्रा

पर्वत


पर्वत धरातल के ऐसे ऊपर उठे भागों के रूप में जाने जाते हैं, जिनका ढाल तीव्र होता है और शिखर भाग संंकुचित क्षेत्र वाला होता है। पर्वतों का निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकरण किया जाता है-
मोड़दार पर्वत (Fold Mountains) - पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों द्वारा धरातलीय चट्टानों में मोड़ या वलन पडऩे के परिणामस्वरूप बने हुए पर्वतों को मोड़दार अथवा वलित पर्वत कहते हैं। उदाहरण- यूरोप के आल्प्स, दक्षिण अमेरिका के एण्डीज व भारत की अरावली शृंखला।

अवरोधी पर्वत या ब्लॉक पर्वत (Block Mountains)- इन पर्वतों का निर्माण पृथ्वी की आंतरिक हलचलों के कारण तनाव की शक्तियों से धरातल के किसी भाग में दरार पड़ जाने के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण- यूरोप में ब्लैक फॉरेस्ट तथा वासगेस (फ्रांस) एवं पाकिस्तान में साल्ट रेंज।

ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic) - इन पर्वतों का निर्माण ज्वालामुखी द्वारा फेंके गए पदार्थों से होता है। उदाहरण- हवाई द्वीप का माउंट माउना लोआ व म्यांमार का माउंट पोपा ।

अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains) - इनका निर्माण विभिन्न कारकों द्वारा अपरदन से होता है। उदाहरण- भारत के अरावली, नीलगिरि आदि।

पठार

साधारणतया अपने सीमावर्ती धरातल से पर्याप्त ऊँचे एवं सपाट तथा चौड़े शीर्ष भाग वाले स्थलरूप को 'पठार' के नाम से जाना जाता है। इनके निम्नलिखित तीन प्रकार होते हैं-
अन्तरापर्वतीय पठार (Intermountane Plateau) - ऐसे पठार चारों ओर से घिरे रहते हैं। उदाहरण- तिब्बत का पठार, बोलीविया, पेरू इत्यादि के पठार।

पीडमॉण्ट पठार (Piedmont Plateau)- उच्च पर्वतों की तलहटी में स्थित पठारों को 'पीडमॉण्ट' पठार कहते हैं। उदाहरण - पीडमॉण्ट (सं. रा. अमेरिका), पेटागोनिया (दक्षिणी अमेरिका) आदि।

महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau) - ऐसे पठारों का निर्माण पटल विरूपणी बलों द्वारा धरातल के किसी विस्तृतभू-भाग के ऊपर उठ जाने से होता है। उदाहरण- भारत के कैमूर, राँची तथा कर्नाटक के पठार।

मरुस्थल

शुष्क जलवायु वाले प्रदेशों में पाये जाने वाले वे क्षेत्र जहाँ वर्षा कम या नहीं के बराबर होती है एवं वनस्पतियां नहीं उगती हैं, मरुस्थल कहलाते हैं। ऐसे प्रदेशों में बालुकाभित्ति, कंकड़-पत्थर एवं चट्टान की अधिकता रहती है। मरुस्थल निम्न प्रकार के होते हैं-

वास्तविक मरुस्थल- इसमें बालू की प्रचुरता पाई जाती है।

पथरीले मरुस्थल- इसमें कंकड़-पत्थर से युक्त भूमि पाई जाती है। इन्हें अल्जीरिया में रेग तथा लीबिया में सेरिर के नाम से जाना जाता है।

चट्टानी मरुस्थल- इनमें चट्टानी भूमि का हिस्सा अधिकाधिक होता है। इन्हें सहारा क्षेत्र में हमादा कहा जाता है।


ज्वालामुखी 

ज्वालामुखी का तात्पर्य उस छिद्र व दरार से होता है जिसके माध्यम से पृथ्वी के आंतरिक भाग में स्थित लावा तथा अन्य पदार्थ धरातल के ऊपर आते हैं। सामान्य रूप से ज्वालामुखी तीन प्रकार के होते हैं-

जाग्रत ज्वालामुखी (Active Volcano)- इस प्रकार के ज्वालामुखी से लावा, गैसों इत्यादि का लगातार उद्गार होता रहता है। उदाहरण- इटली के एटना तथा स्ट्रॉमबोली।

प्रसुप्त ज्वालामुखी (Dormant Volcano)- जिन ज्वालामुखियों में शांतकाल के पश्चात् अचानक उद्गार होता है, उन्हें प्रसुप्त ज्वालामुखी कहते हैं। उदाहरण- इटली का विसूवियस।

शांत ज्वालामुखी (Extinct Volcano)- ये वे ज्वालामुखी हैं  जिनके भविष्य में उद्गार की कोई संभावना नहीं रहती है। उदाहरण- ईरान के कोल सुल्तान व म्यांमार का पोपा आदि।

झील

महाद्वीपों के मध्यवर्ती भाग अर्थात धरातल पर उपस्थित जलपूर्ण भागों को झील  कहते हैं। झीलों की सबसे बड़ी विशेषता उनका स्थल से घिरा होना है। झील निम्न प्रकार की होती हैं-

खारे पानी की झीलें- जिन झीलों में बाहर से पानी आकर मिलता तो है किन्तु निकलकर बाहर नहीं जाता है, वे प्राय: खारी झीलें होती हैं। कैस्पियन सागर विश्व की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है।

ताजे या मीठे पानी की झीलें- वे झीलें  जिनमें नदियों के माध्यम से निरंतर ताजे जल का प्रवाह होता रहता है मीठे पानी की झीलें होती हैं क्योंकि इनमें विभिन्न प्रकार के लवणों का जमाव नहीं होने पाता है। भारत में नैनीताल, भीमताल, कोडाईकनाल आदि मीठे पानी की प्रमुख झीलें हैं।

विवर्तनिक झीलें- भूभर्गिक हलचलों के कारण निर्मित झीलों को विवर्तनिक झीलों के अंतर्गत रखा जाता है।

भ्रंशन द्वारा बनी झीलें- भूगर्भिक हलचलों के कारण धरातल के किसी भाग के नीचे धंस जाने या ऊपर उठ जाने से बनी बेसिनों में जल भर जाने के परिणामस्वरूप ऐसी झीलों का निर्माण होता है।

दरार घाटी झीलें- धरातल की दो समानांतर दरारों के मध्यवर्ती भाग के नीचे धंस जाने एवं उसमें जल भर जाने के फलस्वरूप ऐसी झीलों का निर्माण होता है। इजरायल का मृत सागर इसका उदाहरण है।

क्रेटर झीलें- शांत ज्वालामुखियों के वृहदाकार मुखों या के्रटरों में जल भर जाने से ऐसी झीलों की उत्पत्ति होती है। इसका प्रमुख उदाहरण अफ्रीका की विक्टोरिया झील है।

हिमनद

हिमनद बर्फ का एक विशाल संग्रह होता है, जो निम्न भूमि की ओर धीर-धीरे बढ़ता है। ये तीन तरह के होते हैं-

(1) गिरिपद हिमनद

(2) महाद्वीपीय हिमनद

(3) घाटी हिमनद।

नदी की तरह से हिमनद भी अपरदन, परिवहन और निक्षेपण का कार्य करते हैं। अपरदन के अंतर्गत यह उत्पादन, अपकर्षण और प्रसर्पण का कार्य करते हैं।

मैदान

धरातल पर मिलने वाले अपेक्षाकृत समतल और निम्न भू-भाग को मैदान कहा जाता है। इनका ढाल एकदम न्यून होता है। निर्माण की प्रक्रिया के आकार के आधार पर मैदानों के प्रकार निम्नलिखित हैं-
रचनात्मक मैदान (structural Plains)- रचनात्मक मैदानों का निर्माण पटल विरुपणी बलों के परिणामस्वरूप समुद्री भागों में निक्षेपित जमावों के ऊपर उठाने से होता है। उदाहरण- कोरोमण्डल व उत्तरी सरकार (भारत)।

अपरदनात्मक मैदान (Erosional Plains)- ऐसे मैदानों का निर्माण अपक्षय तथा अपरदन की क्रियाओं के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण- उत्तरी कनाडा, उत्तरी यूरोप, पश्चिमी सर्बिया आदि।

निक्षेपात्मक मैदान (Depositional plains)- अपरदन के कारकों द्वारा धरातल के किसी भाग से अपरदित पदार्थों को परिवहित करके उन्हें दूसरे स्थान पर निक्षेपित कर देने से ऐसे मैदानों की उत्पत्ति होती है। उदाहरण- गंगा-ब्रह्मïपुत्र का मैदान (उत्तर भारत), ह्वांगो (चीन) आदि।

पृथ्वी की संरचना

पृथ्वी की आकृति लध्वक्ष गोलाभ (Oblate spheroid) के समान है। यह लगभग गोलाकार है जो ध्रुवों  पर थोड़ा चपटी है। पृथ्वी पर सबसे उच्चतम बिंदु माउंट एवरेस्ट है जिसकी ऊँचाई 8848 मी. है। दूसरी ओर सबसे निम्नतम बिंदु प्रशांत महासागर में स्थित मारियाना खाई है जिसकी समुद्री स्तर से गहराई 10,911 मी. है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना कई स्तरों में विभाजित है। पृथ्वी की आंतरिक संरचना के तीन प्रधान अंग हैं- ऊपरी सतह भूपर्पटी (Crust), मध्य स्तर मैंटल (mantle) और आंतरिक स्तर धात्विक क्रोड (Core)। पृथ्वी के कुल आयतन का 0.5' भाग भूपर्पटी का है जबकि 83' भाग में मैंटल विस्तृत है। शेष 16' भाग क्रोड है।


भूपर्पटी अथवा क्रस्ट की मोटाई 8 से 40 किमी. तक मानी जाती है। इस परत की निचली सीमा को मोहोरोविसिक असंबद्धता या मोहो असंबद्धता कहा जाता है। पृथ्वी पर महासागर और महाद्वीप केवल इसी भाग में स्थित हैं।


मैंटल की मोटाई लगभग 2895 किमी. है। यह अद्र्ध-ठोस अवस्था में है। एक संक्रमण परत जो मैंटल को क्रोड या कोर से विभक्त करती है उसे गुटेनबर्ग असंबद्धता कहते हैं।
बाह्म्तम क्रोड की विशेषता यह है कि यह तरल अवस्था में है जबकि आंतरिक क्रोड का पदार्थ ठोस पदार्थ की भांति व्यवहार करता है। इसकी त्रिज्या लगभग 1255 किमी. है। आंतरिक क्रोड के घूर्णन का कोणीय वेग पृथ्वी के कोणीय वेग से थोड़ा अधिक होता है।

पृथ्वी का निर्माण आयरन (32.1 फीसदी), ऑक्सीजन (30.1 फीसदी), सिलिकॉन (15.1 फीसदी), मैग्नीशियम (13.9 फीसदी), सल्फर (2.9 फीसदी), निकिल (1.8 फीसदी), कैलसियम (1.5 फीसदी) और अलम्युनियम (1.4 फीसदी) से हुआ है। इसके अतिरिक्त लगभग 1.2 फीसदी अन्य तत्वों का भी योगदान है। क्रोड का निर्माण लगभग 88.8 फीसदी आयरन से हुआ है। भूरसायनशास्त्री एफ. डल्ब्यू. क्लार्क के अनुसार पृथ्वी की भूपर्पटी में लगभग 47 फीसदी ऑक्सीजन है।


पथ्वी की आंतरिक परतें
गहराई (किमी.) परत
0-35 भूपर्पटी या क्रस्ट
35-60 ऊपरी भूपर्पटी
35-2890 मैंटल
2890-5100 बाहरी क्रोड
5100-6378 आंतरिक क्रोड

 

प्लेट टेक्टोनिक्स
महाद्वीपों और महासागरों के वितरण को स्पष्ट करने के लिए यह सबसे नवीन सिद्धांत है। इस सिद्धांत के अनुसार स्थलमंडल कई दृढ़ प्लेटों के रूप में विभाजित है। ये प्लेटें स्थलमंडल के नीचे स्थित दुर्बलतामंडल के ऊपर तैर रही हैं। इस सिद्धांत के अनुसार भूगर्भ में उत्पन्न ऊष्मीय संवहनीय धाराओं के प्रभाव के अंतर्गत महाद्वीपीय और महासागरीय प्लेटें विभिन्न दिशाओं में विस्थापित होती रहती हैं। स्थलमंडलीय प्लेटों के इस संचलन को महाद्वीपों तथा महासागरों के वर्तमान वितरण के लिए उत्तरदायी माना जाता है। जहां दो प्लेटें विपरीत दिशाओं में अपसरित होती हैं उन किनारों को रचनात्मक प्लेट किनारा या अपसारी सीमांत कहते हैं। जब दो प्लेटें आमने-सामने अभिसरित होती हैं तो इन्हें विनाशशील प्लेट किनारे अथवा अभिसारी सीमांत कहते हैं।


सबसे पुरानी महासागरीय भूपर्पटी पश्चिमी प्रशांत में स्थित है। इसकी अनुमानित आयु 20 करोड़ वर्ष है। अन्य प्रमुख प्लेटों में भारतीय प्लेट, अरब प्लेट, कैरेबियाई प्लेट, दक्षिणी अमेरिका के पश्चिमी तट पर स्थित नाज्का प्लेट और दक्षिणी अटलांटिक महासागर की स्कॉटिया प्लेट शामिल हैं। लगभग 5 से 5.5 करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय व ऑस्ट्रेलियाई प्लेटें एक थी।

 

प्रमुख प्लेटें
 प्लेट का नाम  क्षेत्रफल (लाख किमी. में)
 अफ्रीकी प्लेट  78.0
 अंटार्कटिक प्लेट  60.9
 इंडो-ऑस्ट्रेलियाई प्लेट  47.2
 यूरेशियाई प्लेट  67.8
 उत्तरी अमेरिकी प्लेट  75.9
 प्रशांत प्लेट  103.3

 

स्थलाकृतियां
पृथ्वी का तल असमान है। तल का 70.8 फीसदी भाग जल से आच्छादित है, जिसमें अधिकांश महासागरीय नितल समुद्री स्तर के नीचे है। धरातल पर कहीं विशाल पर्वत, कहीं ऊबड़-खाबड़ पठार तो कहीं पर उपजाऊ मैदान पाये जाते हैं। महाद्वीप और महासागरों को प्रथम स्तर की स्थलाकृति माना जाता है जबकि पर्वत, पठार, घाटी निचले स्तरों के अंतर्गत रखे जाते हैं।

पृथ्वी का तल भूवैज्ञानिक समय काल के दौरान प्लेट टेक्टोनिक्स और क्षरण की वजह से लगातार परिवर्तित होता रहता है। प्लेट टेक्टोनिक्स की वजह से तल पर हुए बदलाव पर मौसम, वर्षा, ऊष्मीय चक्र और रासायनिक परिवर्तनों का असर पड़ता है। हिमीकरण, तटीय क्षरण, प्रवाल भित्तियों का निर्माण और बड़े उल्का पिंडों के पृथ्वी पर गिरने जैसे कारकों की वजह से भी पृथ्वी के तल पर परिवर्तन होते हैं।


चट्टान
पृथ्वी की सतह से 16 किमी. की गहराई तक पृथ्वी की भूपर्पटी में पाए जाने वाले 95' पदार्थ चट्टानों के रूप में पाए जाते हैं। इनकी रचना विभिन्न प्रकार के खनिजों का सम्मिश्रण है। विभिन्न आधारों पर किया चट्टानों का वर्गीकरण इस प्रकार है-


आग्नेय शैल (Igneous Rock) - आग्नेय शैल की रचना धरातल के नीचे स्थित तप्त एवं तरल मैग्मा के शीतलन के परिणामस्वरूप उसके ठोस हो जाने पर होती है। उदाहरण- माइका, ग्रेनाइट आदि।

अवसादी शैल (Sedimentary Rocks) - अपक्षय एवं अपरदान के  विभिन्न  साधनों द्वारा मौलिक चट्टानों के विघटन, वियोजन एवं चट्टान-चूर्ण के परिवहन तथा किसी स्थान पर जमाव के फलस्वरूप उसके अवसादों (debris) से निर्मित शैल को अवसादी शैल कहा जाता है। उदाहरण- कोयला, पीट, बालुका पत्थर आदि।

रूपांतरित शैल (Metamorphic rock)- अवसादी एवं आग्नेय शैलों में ताप एवं दबाव के कारण परिवर्तन या रूपांतरण हो जाने से रूपांतरित शैलों का निर्माण होता है। उदाहरण- संगमरमर, क्वाटर्जाइट आदि।

क्वाटर्ज, फेल्सपार, एम्फीबोल, माइका, पाइरोक्सिन और ऑलिविन जैसे सिलिकेट खनिज पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। पृथ्वी की सबसे बाहरी परत को पीडोस्फीयर कहते हैं। इस परत का निर्माण मृदा से हुआ है और इस स्तर पर लगातार मृदा उत्पादन की प्रक्रिया जारी रहती है। पृथ्वी पर स्थलमंडल का निम्नतम बिंदु मृत सागर है जिसकी गहराई समुद्र स्तर से 418 मी. नीचे है जबकि उच्चतम बिंदु माउंट एवरेस्ट है जिसकी समुद्री स्तर से ऊँचाई 8848 मी. है। स्थलमंडल की औसत ऊँचाई 840 मी. है।

महाद्वीप
पृथ्वी पर 7 महाद्वीप स्थित हैं-
एशिया- क्षेत्रफल - 44,614,000 वर्ग किमी.
एशिया सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह विश्व के कुल स्थल क्षेत्र के 1/3 भाग पर स्थित है।  यहाँ की 3/4 जनसंख्या अपने भरण-पोषण के लिए कृषि पर निर्भर है। एशिया चावल, मक्का, जूट, कपास, सिल्क इत्यादि के उत्पादन के मामले में पहले स्थान पर है।


अफ्रीका - क्षेत्रफल - 30,216,000 वर्ग किमी.
अफ्रीका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। अफ्रीका का 1/3 हिस्सा मरुस्थल है। यहाँ की मात्र 10' भूमि ही कृषियोग्य है। हीरे व सोने के उत्पादन में अफ्रीका सबसे ऊपर है।

उत्तर अमेरिका- क्षेत्रफल- 24,230,000 वर्ग किमी. यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह दुनिया के 16' भाग पर स्थित है। कृषीय संसाधनों की दृष्टिïकोण से यह काफी धनी क्षेत्र है। विश्व के कुल मक्का उत्पादन का आधा उत्पादन यहीं होता है। वन, खनिज व ऊर्जा संसाधनों के दृष्टिïकोण से यह काफी समृद्ध क्षेत्र है।

दक्षिण अमेरिका- क्षेत्रफल- 17,814,000 वर्ग किमी. यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा महाद्वीप है। इस महाद्वीप का 2/3 हिस्सा विषुवत रेखा के दक्षिण में स्थित है। इसके बहुत बड़े हिस्से में वन हैं।

अंटार्कटिका- क्षेत्रफल- 14,245,000 वर्ग किमी. यह विश्व का पाँचवा सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह पूरी तरह दक्षिणी गोलाद्र्ध में स्थित है और दक्षिण ध्रुव इसके मध्य में स्थित है। इस महाद्वीप का 99' हिस्सा वर्षपर्यन्त बर्फ से ढंका रहता है। यहाँ की भूमि पूरी तरह बंजर है।

यूरोप - क्षेत्रफल-10,505,000 वर्ग किमी. यूरोप एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जहाँ जनसंख्या घनत्व अधिक होने के साथ-साथ समृद्धता भी है। यहाँ वन, खनिज, उपजाऊ मिट्टी व जल बहुतायत में है। यूरोप के महत्वपूर्ण खनिज संसाधन कोयला, लौह अयस्क, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस हैं।

ऑस्ट्रेलिया- क्षेत्रफल - 8,503,000 वर्ग किमी. यह एकमात्र देश है जो सम्पूर्ण महाद्वीप पर स्थित है। यह देश पादपों, वन्यजीवों व खनिजों के मामले में समृद्ध है लेकिन जल की यहाँ काफी कमी है।


महाद्वीपों के आंकड़े
ाम भूमि क्षेत्रफल का प्रतिशत क्षेत्रफल वर्ग किमी. में जनसंख्या (करोड़ में)
एशिया 29.5 44,614,000 387.9
अफ्रीका 20.0 30,216,000 87.7
उत्तर अमेरिका 16.3 24,230,000 50.1
दक्षिण अमेरिका 11.8 17,814,000 37.9
यूरोप 6.5 10,505,000 72.7
ऑस्ट्रेलिया 5.2 8,503,000 3.2
अंटार्कटिका 9.6 14,245,000 -


पृथ्वी का भूगर्भिक इतिहास

वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की आयु लगभग 4.6 अरब वर्ष है। पृथ्वी के सम्पूर्ण भूगर्भिक इतिहास को निम्नलिखित कल्पों (Eras) में विभाजित किया जा सकता है-

पूर्व कैम्ब्रियन (Pre Cambrian Era) - इसी काल से पृथ्वी की शुरुआत हुई। यह कल्प लगभग 57 करोड़ वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। इस कल्प के दौरान भूपर्पटी, महाद्वीपों व महासागरों इत्यादि का निर्माण हुआ और जीवन की उत्पत्ति भी इसी काल के दौरान हुई।

पुराजीवी काल (Palaeozoic Era)- 57 करोड़ वर्ष पूर्व से 22.5 करोड़ वर्ष तक विद्यमान इस कल्प में जीवों एवं वनस्पतियों का विकास तीव्र गति से हुआ। इस कल्प को निम्नलिखित शकों (Periods) में विभाजित किया गया है-

  • कैम्ब्रियन (Cambrian)
  • आर्डोविसियन (Ordovician)
  • सिल्यूरियन (Silurian)
  • डिवोनियन (Divonian)
  • कार्बनीफेरस (Carboniferous)
  • पर्मियन (Permian)

मेसोजोइक कल्प (Mesozoic era)- इस कल्प की अवधि 22.5 करोड़ से 7 करोड़ वर्ष पूर्व तक है। इसमें रेंगने वाले जीव अधिक मात्रा में विद्यमान थे। इसे तीन शकों में विभाजित किया गया है-

  • ट्रियासिक (Triassic)
  • जुरासिक (Jurassic)
  • क्रिटैशियस (cretaceous)


सेनोजोइक कल्प (Cenozoic era)- इस कल्प का आरंभ आज से 7.0 करोड़ वर्ष पूर्व हुआ था। इस कल्प में ही सर्वप्रथम स्तनपायी जीवों का आविर्भाव हुआ। इस युग को पाँच शकों में विभाजित किया गया है-

  • पैलियोसीन (Paleocene)
  • इयोसीन (Eocene)
  • ओलिगोसीन (Oligocene)
  • मायोसीन (Miocene)
  • प्लायोसीन (Pliocene)

इस युग में हिमालय, आल्प्स, रॉकीज, एण्डीज आदि पर्वतमालाओं का विकास हुआ।

नियोजोइक या नूतन कल्प (Neozoic Era) - 10 लाख वर्ष पूर्व से वर्तमान समय तक चलने वाले इस कल्प को पहले चतुर्थक युग (Quaternary Epoch) में रखकर पुन: प्लीस्टोसीन हिमयुग (Pleistocene) तथा वर्तमान काल जिसे होलोसीन (Holocene) कहा जाता है, में वर्गीकृत किया जाता है।

पर्वत
पर्वत धरातल के ऐसे ऊपर उठे भागों के रूप में जाने जाते हैं, जिनका ढाल तीव्र होता है और शिखर भाग संंकुचित क्षेत्र वाला होता है। पर्वतों का निम्नलिखित चार भागों में वर्गीकरण किया जाता है-
मोड़दार पर्वत (Fold Mountains) - पृथ्वी की आंतरिक शक्तियों द्वारा धरातलीय चट्टानों में मोड़ या वलन पडऩे के परिणामस्वरूप बने हुए पर्वतों को मोड़दार अथवा वलित पर्वत कहते हैं। उदाहरण- यूरोप के आल्प्स, दक्षिण अमेरिका के एण्डीज व भारत की अरावली शृंखला।

अवरोधी पर्वत या ब्लॉक पर्वत (Block Mountains)- इन पर्वतों का निर्माण पृथ्वी की आंतरिक हलचलों के कारण तनाव की शक्तियों से धरातल के किसी भाग में दरार पड़ जाने के परिणामस्वरूप होता है। उदाहरण- यूरोप में ब्लैक फॉरेस्ट तथा वासगेस (फ्रांस) एवं पाकिस्तान में साल्ट रेंज।

ज्वालामुखी पर्वत (Volcanic) - इन पर्वतों का निर्माण ज्वालामुखी द्वारा फेंके गए पदार्थों से होता है। उदाहरण- हवाई द्वीप का माउंट माउना लोआ व म्यांमार का माउंट पोपा ।

अवशिष्ट पर्वत (Residual Mountains) - इनका निर्माण विभिन्न कारकों द्वारा अपरदन से होता है। उदाहरण- भारत के अरावली, नीलगिरि आदि।

 

पठार
साधारणतया अपने सीमावर्ती धरातल से पर्याप्त ऊँचे एवं सपाट तथा चौड़े शीर्ष भाग वाले स्थलरूप को 'पठार' के नाम से जाना जाता है। इनके निम्नलिखित तीन प्रकार होते हैं-
अन्तरापर्वतीय पठार (Intermountane Plateau) - ऐसे पठार चारों ओर से घिरे रहते हैं। उदाहरण- तिब्बत का पठार, बोलीविया, पेरू इत्यादि के पठार।
पीडमॉण्ट पठार (Piedmont Plateau)- उच्च पर्वतों की तलहटी में स्थित पठारों को 'पीडमॉण्ट' पठार कहते हैं। उदाहरण - पीडमॉण्ट (सं. रा. अमेरिका), पेटागोनिया (दक्षिणी अमेरिका) आदि।
महाद्वीपीय पठार (Continental Plateau) - ऐसे पठारों का निर्माण पटल विरूपणी बलों द्वारा धरातल के किसी विस्तृतभू-भाग के ऊपर उठ जाने से होता है। उदाहरण- भारत के कैमूर, राँची तथा कर्नाटक के पठार।

पृथ्वी

पृथ्वी  पूरे ब्रह्मांड में एक मात्र एक ऐसी ज्ञात जगह है जहां जीवन का अस्तित्व है। इस ग्रह का निर्माण लगभग 4.54 अरब वर्ष पूर्व हुआ था और इस घटना के 1 अरब वर्ष पश्चातï यहां जीवन का विकास शुरू हो गया था। तब से पृथ्वी के जैवमंडल ने यहां के वायु मण्डल में काफी परिवर्तन किया है। समय बीतने के साथ ओजोन पर्त बनी जिसने पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र के साथ मिलकर पृथ्वी पर आने वाले हानिकारक सौर विकरण को रोककर इसको रहने योग्य बनाया।


पृथ्वी का द्रव्यमान 6.569&1021 टन है। पृथ्वी बृहस्पति जैसा गैसीय ग्रह न होकर एक पथरीला ग्रह है। पृथ्वी सभी चार सौर भौमिक ग्रहों में द्रव्यमान और आकार में सबसे बड़ी है। अन्य तीन भौमिक ग्रह हैं- बुध, शुक्र और मंगल। इन सभी ग्रहों में पृथ्वी का घनत्व, गुरुत्वाकर्षण, चुम्बकीय क्षेत्र, और घूर्णन सबसे ज्यादा हैं।


ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी सौर-नीहारिका (nebula) के अवशेषों से अन्य ग्रहों के साथ ही बनी। निर्माण के बाद पृथ्वी गर्म होनी शुरू हुई। इसका अंदरूनी हिस्सा गर्मी से पिघला और लोहे जैसे भारी तत्व पृथ्वी के केंद्र में पहुँच गए। लोहा व निकिल गर्मी से पिघल कर द्रव में बदल गए और इनके घूर्णन से पृथ्वी दो ध्रुवों वाले विशाल चुंबक में बदल गई। बाद में पृथ्वी में महाद्वीपीय विवर्तन या विचलन जैसी भूवैज्ञानिक क्रियाएँ पैदा हुईं। इसी प्रक्रिया से पृथ्वी पर महाद्वीप, महासागर और वायुमंडल आदि बने।


पृथ्वी की गतियाँ
पृथ्वी अपने अक्ष पर निरंतर घूमती रहती है। इसकी दो गतियाँ हैं-


घूर्णन (Rotation)

पृथ्वी के अपने अक्ष  पर चक्रण को घूर्णन कहते हैं। पृथ्वी पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती है और एक घूर्णन पूरा करने में 23 घण्टे, 56 मिनट और 4.091 सेकेण्ड का समय लेती है। इसी से दिन व रात होते हैं।


परिक्रमण (Revolution)

पृथ्वी सूर्य के चारों ओर अंडाकार पथ पर 365 दिन, 5 घण्टे, 48 मिनट व 45.51 सेकेण्ड में एक चक्कर पूरा करती है, जिसे उसकी परिक्रमण गति कहते हैं। पृथ्वी की इस गति की वजह से ऋतु परिवर्तन होता है।

अक्षांश रेखाएँ (Latitude)

ग्लोब पर पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गईं काल्पनिक रेखाओं को अक्षांश रेखाएं कहते हैं। अक्षांश रेखाओं की कुल संख्या 180 है। प्रति 1श की अक्षांशीय दूरी लगभग 111 किमी. के बराबर होते हैं। अक्षांश रेखाओं में

तीन प्रमुख रेखाएं हैं-

  • कर्क रेखा (Tropic of cancer)- यह रेखा उत्तरी गोलाद्र्ध में भूमध्यरेखा के समानांतर 23 30' पर खींची गई है।
  • मकर रेखा (Tropic of Capricorn)- यह रेखा दक्षिणी गोलाद्र्ध में भूमध्य रेखा के समानांतर 23 30' अक्षांश पर खींची गयी है।
  • विषुवत अथवा भूमध्य रेखा (Equator)- यह रेखा पृथ्वी को उत्तरी गोलाद्र्ध (Northern Hemisphere) और दक्षिणी गोलाद्र्ध (Southern Hemisphere)-दो बराबर भागों में बाँटती है। इसे शून्य अंश अक्षांश रेखा भी कहते हैं।

 

प्रत्येक वर्ष दो संक्रांति होती हैं
कर्क संक्रांति (Summer Solistice) - 21 जून को सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस स्थिति को कर्क संक्रांति (Summer Solistice) कहते हैं।
मकर संक्रांति (Winter Solistice)- 22 दिसम्बर को सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत चमकता है। इस स्थिति को मकर संक्रांति (Winter Solistice) कहते हैं।

 

देशांतर रेखाएँ (Longitudes)
पृथ्वी पर  दो अक्षांशों के मध्य कोणीय दूरी को देशांतर कहा जाता है। भूमध्य रेखा पर 1श के अंतराल पर देशांतरों के मध्य दूरी 111.32 किमी. होती है। दुनिया का मानक समय इसी रेखा से निर्धारित किया जाता है। इसीलिए इसे प्रधान मध्यान्ह देशांतर रेखा (Prime Meridian) कहते हैं। लंदन का एक नगर ग्रीनविच इसी रेखा पर स्थित है, इसलिए इस रेखा को ग्रीनविच रेखा भी कहते हैं। 1श देशांतर की दूरी तय करने में पृथ्वी को 4 मिनट का समय लगता है।

  • स्थानीय समय (Local Time)- पृथ्वी पर स्थान विशेष के सूर्य की स्थिति से परिकल्पित समय को स्थानीय समय कहते हैं।
  • मानक समय (Standard Time)- किसी देश अथवा क्षेत्र विशेष में किसी एक मध्यवर्ती देशांतर रेखा के स्थानीय समय को पूरे देश अथवा क्षेत्र का समय मान लिया जाता है जिसे मानक समय कहते हैं। भारत के 82 30' पूर्व देशांतर रेखा के स्थानीय समय को पूरे देश का मानक समय माना गया है।
  • अंतर्रा्रीय तिथि रेखा (International Date Line) - यह एक काल्पनिक रेखा है जो प्रशांत महासागर के बीचों-बीच 180श देशांतर पर उत्तर से दक्षिण की ओर खींची गई है। इस रेखा के पूर्व व पश्चिम में एक दिन का अंतर होता है।